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ऑक्सीजन की निर्बाध सप्लाई की तैयारी सिर्फ कागजों पर, खड़ा नहीं किया गया सप्लाई चैन; स्वास्थ्य मंत्रालय ने साधा मौन

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने मंगलवार को खपत की तुलना में अतिरिक्त 1900 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता का दावा किया था।

नई दिल्ली। कोरोना के खिलाफ लड़ाई के लिए टेस्टिंग किट, पीपीई किट, कोविड अस्पतालों की बड़े पैमाने पर व्यवस्था करने वाले स्वास्थ्य मंत्रालय की सांस ऑक्सीजन ने फुला दी है। ऑक्सीजन की पर्याप्त उत्पादन क्षमता के बावजूद अस्पतालों तक उनकी आपूर्ति करने का सिस्टम गायब है। सबसे बड़ी बात है कि स्वास्थ्य मंत्रालय के पास इस संबंध में उठ रहे सवालों के जवाब में चुप्पी है।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने मंगलवार को खपत की तुलना में अतिरिक्त 1900 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता का दावा किया था। यही सही भी है कि ऑक्सीजन की कमी नहीं है। आल इंडिया इंडस्ट्रीयल गैस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (AIIGMA) की ओर से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे सात राज्यों में सुचारू मेडिकल आक्सीजन सप्लाई के लिए तैनात नोडल अधिकारी अनिर्बन सेन भी मानते हैं कि लिक्विड मेडिकल आक्सीजन के उत्पादन की कोई समस्या नहीं है। समस्या लिक्विड ऑक्सीजन को फिलिंग स्टेशन तक ले जाने और उसे सिलेंडर में भरकर कोरोना के अस्पतालों तक पहुंचाने की है। अनिर्बन सेन के अनुसार जुलाई के बाद कोरोना का संक्रमण ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैला है और टीयर-दो और टीयर तीन शहरों से कोरोना के मरीजों के लिए ऑक्सीजनकी मांग उसी अनुपात में बढ़ गई है। लेकिन इन शहरों तक लिक्विड आक्सीजन पहुंचाने के लिए न तो पर्याप्त संख्या में टैंकर है और न ही उसे सिलेंडर में भरने का सिस्टम मौजूद है। ऐसे में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के बावजूद ऑक्सीजन की सप्लाई करना संभव नहीं हो पा रहा है। जाहिर है कुछ राज्यों की ओर से आक्सीजन की दूसरे राज्यों सप्लाई रोकना समस्या का समाधान नहीं है। यही कारण है कि बड़े अस्पतालों में यह समस्या नहीं है। दिल्ली एनसीआर के यशोदा अस्पताल के एमडी पीएन अरोड़ा इस संबंध में पूछे जाने पर साफ कहते हैं कि आक्सीजन की कोई कमी नहीं है। उन्हें आक्सीजन मिलने में भी समस्या नहीं आ रही है। लेकिन छोटे शहरों या बड़े शहरों के भी छोटे निजी अस्पतालों में समस्या खड़ी हो रही है।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने साध रखी है चुप्पी

ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे राज्यों की सहायता के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक कंट्रोल रूम भी बना रखा है। लेकिन इस कंट्रोल रूम के कामकाज के बारे में वह कुछ भी बताने को तैयार नहीं है। दैनिक जागरण ने स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रवक्ता मनीषा वर्मा से जानना चाहा कि सरकार आक्सीजन पहुंचाने के लिए टैंकरो व सिलेंडर की आपूर्ति और उसके फिलिंग की प्रणाली लगाने के लिए क्या कदम उठा रही है? विभिन्न राज्यों ने आक्सीजन की मांग और आपूर्ति में कितना अंतर है और इसके लिए राज्य सरकारें केंद्र से किस तरह सहायता की मांग की है? लेकिन मंत्रालय में चुप्पी है। कोरोना मरीजों की मेडिकल आक्सीजन की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए गठित समिति के अध्यक्ष व औद्योगिक संव‌र्द्धन विभाग के सचिव गुरूप्रसाद महापात्रा भी आक्सीजन की कमी से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए उपलब्ध हुए।

ऑक्सीनज सप्लाई के लिए सभी राज्यों को लिखा गया था पत्र

सरकार को ऑक्सीजन की बड़े पैमाने पर जरूरत का अंदाजा था। 24 मार्च से पूरे देश में कड़े लॉकडाउन की घोषणा के अगले दिन ही 25 मार्च को केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने बाद ही ऑक्सीजन के उत्पादन और अबाध सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्यों को पत्र लिख दिया। इसके 10 दिन बाद ही चार अप्रैल को आक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए औद्योगिक संव‌र्द्धन विभाग के सचिव गुरूप्रसाद महापात्रा की अध्यक्षता में नौ सदस्यी कमेटी का गठन किया। इसके दो दिन बाद छह मार्च को गृह सचिव ने एक बार फिर आक्सीजन को जरूरी दवा बताते हुए इसकी सुचारू सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए पत्र लिखा। सात अप्रैल को औद्योगिक ऑक्सीजन उत्पादकों को मेडिकल ऑक्सीजन उत्पादन की अनुमति दे दी गई। 18 अप्रैल को पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पेसो) ने लिक्विड आक्सीजन उत्पादन की ऑनलाइन मॉनिटरिंग के लिए सॉफ्टवेयर लांच किया। इसके बाद 22 अप्रैल को आक्सीजन के बढ़ते खपत को देखते हुए पेसो ने नाइट्रोजन, अर्गोन, हेलियम और औद्योगिक आक्सीजन सिलेंडर के मेडिकल आक्सीजन सिलेंडर में बदलने का एसओपी जारी किया।

ऑक्सीजन की कालाबाजारी की शिकायतें

इन सारी तैयारियों के बावजूद जुलाई में कोरोना के बढ़ते मामलों के बाद ऑक्सीजन की कालाबाजारी की शिकायतें आनी शुरू हो गई। इसे रोकने के लिए 24 जुलाई को अनधिकृत व्यक्ति के लिए खाली सिलेंडर में आक्सीजन भरवाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसी दिन आक्सीजन उत्पादकों, उसे सिलेंडर में भरने वाले और भरे हुए सिलेंडर का स्टॉक रखने वाली सभी कंपनियों के लिए प्रतिदिन का डाटा रखना अनिवार्य कर दिया। लेकिन  ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाने के लिए टैंकर, सिलेंडर और उसके फिलिंग स्टेशन की संख्या बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया गया। जाहिर समस्या बढ़ती चली गई। आखिरकार 17 अगस्त को पेसो ने लिक्विड नाइट्रोजन ढोने वाले टैंकरों को ऑक्सीजन ढोने की अनुमति दी। लेकिन इससे भी अस्पतालों तक आक्सीजन की अबाध आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो सकी। आक्सीजन की कमी के राजनीतिक मुद्दा बनते देख महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों ने इसके दूसरे राज्यों में भेजने पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया और मामला अदालत तक जा पहुंचा। लेकिन जिसे इस पर निगरानी रखनी है वह चुप है।

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