क्या आपने कभी गौर किया है कि भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) की मूर्ति बाकी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से इतनी अलग क्यों दिखाई देती है? उनकी बड़ी-बड़ी आंखें, अनोखा चेहरा और बिना पूरे हाथ-पैर का स्वरूप देखकर कई लोगों के मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर ऐसा क्यों है। क्या यह मूर्ति अधूरी रह गई थी, या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है? इस अनोखे स्वरूप के पीछे एक प्राचीन और लोकप्रिय धार्मिक कथा जुड़ी है, जो भगवान की दिव्य लीला और भक्तों की अटूट आस्था को दर्शाती है।
राजा इंद्रद्युम्न को मिला था मूर्ति स्थापना का दिव्य आदेश
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने मालवा के राजा इंद्रद्युम्न (King Indradyumna) को स्वप्न में दर्शन दिए और उन्हें अपने दिव्य स्वरूप की प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। राजा ने इसे ईश्वर की आज्ञा मानकर पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ भव्य मंदिर और मूर्ति निर्माण की तैयारियां शुरू कर दीं।
देवशिल्पी विश्वकर्मा ने रखी थी बंद कमरे की कड़ी शर्त
कथा के अनुसार, स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा (Vishwakarma) एक वृद्ध कारीगर का रूप धारण करके राजा के पास पहुंचे और भगवान की प्रतिमा बनाने का दायित्व स्वीकार किया। हालांकि, उन्होंने एक महत्वपूर्ण शर्त रखी—जब तक मूर्ति निर्माण का कार्य पूरा न हो जाए, तब तक कोई भी उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। यदि इस शर्त का उल्लंघन हुआ, तो वे तुरंत काम छोड़कर चले जाएंगे। राजा ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली और बंद कमरे में मूर्ति निर्माण का कार्य आरंभ हो गया।
कई दिन बीत गए, लेकिन कमरे के भीतर से कोई आवाज नहीं आई। शांत माहौल देखकर धीरे-धीरे राजा और रानी को चिंता होने लगी कि कहीं उस वृद्ध शिल्पकार के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। रानी के बार-बार आग्रह करने पर अंततः राजा ने अपना धैर्य खो दिया और कमरे का दरवाजा खुलवा दिया।राजा की चिंता और अधूरे रह गए भगवान के हाथ-पैर
जैसे ही दरवाजा खोला गया, देवशिल्पी विश्वकर्मा तत्काल वहां से अदृश्य हो गए। उस समय भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र (Lord Balabhadra) और देवी सुभद्रा (Devi Subhadra) की प्रतिमाएं पूरी तरह तैयार नहीं हुई थीं और उनके हाथ-पैर अधूरे ही थे। तभी एक दिव्य आकाशवाणी हुई कि यही भगवान का इच्छित और दिव्य स्वरूप है। इसी रूप में उनकी पूजा की जाएगी और यही स्वरूप युगों-युगों तक भक्तों के लिए श्रद्धा का परम केंद्र रहेगा।
आज भी पुरी धाम में इसी स्वरूप की होती है पूजा
आज ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध पुरी धाम (Puri Jagannath Temple) में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की इन्हीं अनोखी प्रतिमाओं की पूजा की जाती है। दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए आते हैं और विशेष रूप से आषाढ़ माह में निकलने वाली भव्य रथ यात्रा (Rath Yatra) में शामिल होते हैं।
अधूरी होकर भी क्यों पूर्ण मानी जाती है यह प्रतिमा?
धार्मिक मान्यताओं और दर्शन के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की यह प्रतिमा यह संदेश देती है कि ईश्वर किसी बाहरी पूर्णता या आकार के मोहताज नहीं हैं। उनका दिव्य स्वरूप मानव कल्पना और सामान्य सौंदर्य की सीमाओं से कहीं परे है। इसलिए यह प्रतिमा सांसारिक दृष्टि से अधूरी दिखाई देने के बावजूद आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण मानी जाती है और करोड़ों भक्तों की आस्था का सर्वोच्च प्रतीक है।
नोट: यह लेख प्रचलित धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित है। विभिन्न परंपराओं और ग्रंथों में इस कथा के अलग-अलग संस्करण भी मिलते हैं।
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