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सागर हत्याकांड में नाम आने के बाद से पुलिस से बचने के लिए लोकेशन बदलता रहा सुशील, 18 दिन बाद ऐसे चढ़ा हत्थे

पांच मई की सुबह ट्रामा सेंटर में इलाज के दौरान सागर की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने जैसे ही सुशील व कुछ अन्य के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया।सुशील को इसकी जानकारी मिलते ही वह बापरोल स्थित घर से अजय के साथ फरार हो गया।

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ई दिल्ली। सागर धनखड़ हत्याकांड के मुख्य आरोपित ओलंपियन सुशील कुमार व दिल्ली पुलिस के बीच पिछले 18 दिनों तक चूहे-बिल्ली का खेल चलता रहा। मोबाइल की लोकेशन के आधार पर दिल्ली पुलिस की 20 से ज्यादा टीमें सुशील का उत्तराखंड से लेकर दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में पीछा करती रही वह चकमा देकर भागता रहा। अंततः मुखबिर की सूचना पर स्पेशल सेल ने उसे एक साथी अजय के साथ दिल्ली से दबोच लिया। हालांकि, सुशील की गिरफ्तारी दिल्ली से होने की बात किसी को हजम नहीं हो रही है। जब सुशील के पीछे 100- 150 से अधिक पुलिसकर्मी दो सप्ताह से उत्तराखंड, हरियाणा व पंजाब में खाक छान रही थी। ऐसे में उसके दिल्ली आने का कोई तुक नहीं था ताकि वह पूरी दिल्ली पुलिस के राडार पर चढ़ जाय।

दो तीन नया मोबाइल व 6 से ज्यादा दूसरे के नाम पर लिए गए सिम का किया इस्तेमाल

पांच मई की सुबह सुश्रुत ट्रामा सेंटर में इलाज के दौरान सागर की मौत हो जाने के बाद माडल टाउन थाना पुलिस ने जैसे ही सुशील व कुछ अन्य के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया। सुशील को इसकी जानकारी मिलते ही वह बापरोल स्थित घर से अजय के साथ फरार हो गया। सभी आरोपितों को उसने अपने-अपने हिसाब से भूमिगत हो जाने को कहा। अजय के साथ सुशील समयपुर बादली तक ही गया और वहां उतर कर अजय को कही और जगह जाकर छिप जाने को कहा।

सहयोगी भूरा के साथ गया था हरिद्वार के आश्रम

समयपुर बादली में सुशील ने अपने पूर्व सहयोगी भूरा को बुलाकर उसके साथ हरिद्वार स्थित एक बाबा के आश्रम चला गया। भूरा को सुशील ने उसी रात वापस भेज दिया और वह खुद छह मई को दिल्ली आया। दिल्ली आने के दौरान ही उसकी तस्वीर मेरठ के टोल के सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई थी। दिल्ली में वह दो दिन रुका। बापरोला आने के दौरान उसने पहले अपनी गाड़ी घर भेज दिया ताकि आसपास अगर पुलिस हो तो गाड़ी रोकने की कोशिश करें। काफी देर बाद वह साथी के साथ पैदल आया था। यहां के बाद वह बहादुरगढ़ चला गया। वहां एक दिन अपने सुशील इंटर नेशनल स्कूल में रुका। स्कूल सुशील का भाई अमरजीत व मंजीत चलाता है।

मोबाइल लोकेेशन के आधार पर हो रही थी तलाश

पुलिस पहले सुशील के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर उसे ढूढ़ना शुरू किया। उसके मोबाइल की लोकेशन पहले हरिद्वार के एक आश्रम में मिली और अगले दिन बापरोला में। बहादुरगढ़ में सुशील ने दो मोबाइल खरीद लिया। अमरजीत ने किसी युवक की आईडी पर चार सिम मंगवाकर सुशील को दे दिया। उसके बाद सुशील उक्त नए सिम का इस्तेमाल करने लगा। बहादुरगढ़ में लोकेशन मिलने पर पुलिस की कई टीमें वहां अखाड़े व स्कूल में खाक छानती रही। बहादुरगढ़ के पते पर सिम की जानकारी मिलने पर पुलिस ने जब उक्त युवक को पकड़ा तो उसने बताया कि उसने अमरजीत के कहने पर उसे चार सिम लेकर दिया था। उसे क्या पता कि वह सुशील को दे देगा। उक्त नंबरों की लोकेशन बाद में बठिंडा से आसपास मिलने लगी। उसके बाद सभी टीम वहां चली गई। लोकेशन के आधार पर पुलिस उसकी तलाश करती रही। लेकिन वह नहीं मिला। पुलिस का कहना है कि दरअसल, सुशील जहां भी ठहरता था वहां फोन का इस्तेमाल नहीं करता था बल्कि 6- 8 किलोमीटर दूर जाकर करता था और फिर अपने ठिकाने पर आ जाता था

कुई जगहों पर हुई छापेमारी पर भागने में रहा सफल

बठिंडा में पुलिस को सुशील द्वारा कुछ नए नंबरों का इस्तेमाल करने की जानकारी मिली। वह सुखप्रीत सिंह बरार नाम के व्यक्ति का सिम इस्तेमाल कर रहा था। सुखप्रीत को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो उसने बताया कि ममेरे भाई अमन के जरिये सुशील को सिम भिजवाया था। पुलिस बठिंडा में अलग-अलग लोकेशन पर छापेमारी कर ही रही थी कि शुक्रवार से उसके एक और नए नंबर की लोकेशन चंडीगढ़ में मिली। जिसके बाद पुलिस टीम जब वहां गई तो वह भागकर वापस बठिंडा आ गया फिर वहां से गुरुग्राम आया और दिल्ली आने पर उसे दबोच लिया गया।

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