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रामायण काल से संबंध रखता है मदागन सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, लाल बलुआ पत्थर से हुआ है निर्माण

विदिशा: महाशिवरात्रि का त्योहार मनाने के लिए देशभर में तैयारियां शुरु हो गई है। ऐसे में भगवान शिव की आराधना के लिए भक्तों का मंदिरों में तांता लगना शुरु हो गया है। ऐसे में आज हम आपको भगवान शिव के ऐतिहासिक मंदिर के बारे में बताएंगे जहां दर्शन करने मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यह मंदिर स्थित है विदिशा जिले की लटेरी तहसील में। लटेरी धार्मिक क्षेत्रों में अपनी विशेष पहचान रखती है, यहां एक नहीं अपितु अनेका अनेक धार्मिक तीर्थ स्थल मौजूद हैं। जिनकी ख्याति मध्यप्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में भी है। बात अगर ऐतिहासिक मंदिरों के बारे में की जाए तो यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है जो अपने आप में कई साल पुरानी भारतीय परंपरा को समेटे हुए हुए है।

विदिशा जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर लटेरी का यह मंदिर छोटी मदागन सिध्देश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। आसपास के क्षेत्र सहित दूर दराज के शिव भक्तों के लिए यह धार्मिक स्थल आस्था का केंद्र बन चुका है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण हजारों वर्ष पहले किया गया था। लेकिन मुगल शासनकाल में इस मंदिर को खण्डित कर दिया गया। जिसके बाद 16वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी देवी अहिल्या बाई होलकर के शासन काल में इसका जीर्णोद्धार कराया गया।

मंदिर से जुड़ी खास बातें…
अनुश्रुतियों के अनुसार यह स्थल रामायण काल से संबंद्ध रखता है। महर्षि बाल्मिकि आश्रम के रूप में प्रसिद्ध इस स्थल पर परमार काल में भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित इस मंदिर की तल योजना गर्भग्रह एंव मण्डप युक्त रही है। कालांतर में मण्डप भाग ध्वस्त हो चुका है। यह भाग चबूतरे के रूप में अवशिष्ट है इसमे ऊद्धर्व विन्यास, वैदीबन्ध, जंघा एवं शिखर समाहित हैं, शिखर भाग की पुर्नसंरचना परवर्ती काल में की गई थी तथा मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है।

द्वार चौखट के ललाट बिम्ब पर गणेश एवं उत्तरंग पर नव देवियों के चित्रों का अंकन है, द्वारशाखा के दोनों ओर नंदी, देवी गंगा और यमुना उत्कीर्ण हैं। स्तंभ शाखा में शैव द्वारपाल एवं पृष्ट शाखों में अलंकरण एवं कुबैर के चित्रों का शिल्पाकंन है। गर्भगृह की बाह्य भित्तियों के गवाक्षों में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव प्रतिमाओं का शिल्पांकन है। अंतराल के बाह्य गवाक्षों में गरूडासीन लक्ष्मीनारायण एंव उमा-महेश्वर का अंकन है।  भूमिज शैली के इस मंदिर के वेदीबंध जंघा भाग अलंकृत हैं।

जंघा के ऊपर नाग शिखर स्थित है तथा शिखर की पुर्नसंरचना के कारण लता एंव क्षैतिज लंबवृत कूट स्तंभ अव्यवस्थित हो गये हैं। शिखर के मध्य शुखनासिका गवाक्ष हैं उसके ऊपर लघु शिखरावतियों की ऊर्ध्वाकार पंक्तियां स्थित हैं। शिखर के शीर्ष पर आमलख एंव कलश की संरचनाऐं मौजूद हैं। जिससे मंदिर का निर्माण काल लगभग 11वीं सदी उत्तरार्ध है। वर्तमान मे यह मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। यह शिवरात्रि व्रत व्रतराज के नाम से विख्यात है, चारों पुरूषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।

शास्त्र कहते हैं कि संसार में अनेक प्रकार के व्रत, विविध तीर्थ स्नान, नाना प्रकार के दान, अनेक प्रकार के यज्ञ, तरह तरह के तप तथा जप आदि भी महाशिवरात्रि व्रत की समानता नहीं कर सकते अतः अपने हित साधनार्थ सभी को इस व्रत का अवश्य पालन करना चाहिये। महाशिवरात्रि व्रत परम मंगलमय और दिव्यतापूर्ण है इससे सदा सर्वदा भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है यह शिवरात्रि व्रत व्रतराज के नाम से विख्यात है। महाशिवरात्रि अपने भीतर स्थित शिव को जानने का महापर्व है वैसे हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि होती है पर फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि का विशेष महत्व होने के कारण ही उसे महाशिवरात्रि कहा गया है। यह भगवान शिव की विराट दिव्यता का महापर्व है इस महापर्व के दौरान समूचे लटेरी नगर को दुल्हन की तरह सजाकर शिव बरात की अगुवानी की जाती है।

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