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उत्तराखंड की सियासी परंपरा को नहीं तोड़ पाए त्रिवेंद्र, तिवारी को छोड़ कोई CM नहीं पूरा कर पाया कार्यकाल

देहरादूनः उत्तराखंड के सियासी रिवाज को त्रिवेंद्र सिंह रावत भी नहीं तोड़ पाए। 9 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड एक अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया था, लेकिन ये एक तल्ख हकीकत है कि उत्तराखंड राज्य को बने हुए 20 बरस गुजर चुके हैं, लेकिन नारायण दत्त तिवारी को छोड़ कर कोई भी नेता मुख्यमंत्री के अपने 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्रियों के 5 बरस का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन को बदलने की अब एक परंपरा सी बन गई है। बीजेपी के जितने भी मुख्यमंत्री उनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। केवल कांग्रेस के शासन में मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ही अपना कार्यकाल पूरा कर पाए थे। गैरसैंण के बजट सेशन तक लग रहा था कि त्रिवेंद्र सिंह रावत इस परंपरा को तोड़ देंगे, लेकिन चार साल के कार्यकाल के पूरे होने से महज 9 दिन पहले हुए राजनीतिक उठापटक के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस्तीफा सौंप दिया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कैबिनेट और पार्टी के सहयोगियों के साथ जाकर गवर्नर बेबी रानी मौर्य को डेढ़ लाइन में अपना इस्तीफा सौंप दिया।

उत्तराखंड के इतिहास पर अगर नजर डालें, तो पता चलता है कि महज 20 साल में इस पहाड़ी राज्य में केवल एक मुख्यमंत्री ही कार्यकाल पूरा कर पाया है। उत्तराखंड में बार बार अंदरूणी खींचतान की वजह से मुख्यमंत्री का सिंहासन हिलता रहता है। तिवारी को छोड़कर ऐसा एक भी नेता नहीं है, जिसने 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर पाया हो। त्रिवेंद्र सिंह रावत भी अब इस फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं। अगले मुख्यमंत्री के बारे में ये अभी से तय हो गया है कि उसका कार्यकाल केवल एक साल का ही होगा। बार बार नेतृत्व परिवर्तन और अंदरूणी खींचतान ने संभावनाओं से भरे इस प्रदेश का काफी नुकसान किया है।

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