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UP Assembly Elections: 2022 में मेरठ की 7 विधानसभा सीटों पर BJP की होगी अग्नि परीक्षा

मेरठ जिले की इन सात सीटों पर बीजेपी, सपा और बसपा के बीच जोर आजमाइश चल रही है।

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लखनऊः मेरठ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र बिंदू माना जाता है। मेरठ जिले का राजनीतिक समीकरण आसपास की सीटों को भी प्रभावित करता है। इसलिए हर राजनीतिक पार्टी मेरठ से ही वेस्ट यूपी को साधने की कोशिश करती है। मेरठ जिले के दायरे में आने वाली विधानसभा की सात सीटों पर पहले चरण में ही वोट डाले जाएंगे। मेरठ कैंट, मेरठ सदर, हस्तिनापुर, किठौर, सरधना, सिवालखास और मेरठ साउथ सीट पर चुनावी बुखार चढ़ चुका है।

मेरठ जिले की इन सात सीटों पर बीजेपी, सपा और बसपा के बीच जोर आजमाइश चल रही है। मेरठ जिले की सात विधानसभा सीट के सियासी नतीजे को तय करने में जाट समाज की निर्णायक भूमिका है, लेकिन जाट वोटरों को साधने में किसी भी पार्टी की रणनीति बनाने वालों के माथे पर पसीना आ जाता है। मूल रूप से खेती किसानी से जुड़े जाटों का वोट बैंक कब किस ओर पलट जाए इसके बारे में पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता है। किसान आंदोलन और राकेश टिकैत की वजह से जाट बिरादरी में बीजेपी की पकड़ के कमजोर होने का दावा किया जा रहा है, हालांकि तीनों कृषों कानूनों की वापसी और गन्ने की कीमत बढ़ाकर नाराज जाटों को मनाने की बीजेपी ने कोशिश की है। इसके अलावा जाट नेता राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर विश्वविद्यालय के निर्माण का ऐलान भी सरकार की तरफ से किया गया है। इस तरह की रणनीति से बीजेपी मेरठ सहित पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट बिरादरी को साधने में लगी है। आइए मेरठ की सात विधानसभा सीट पर डालते हैं एक नजर

अब बात करते हैं मेरठ की 7 सीटों पर सामाजिक समीकरण की। मेरठ शहर सीट में हमेशा से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता रहा है। यहां पर हार जीत का फैसला चंद हजार वोटों के मार्जिन से ही होता है। इस सीट पर जब जब ध्रुवीकरण हुआ है तब तब बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा है। इस सीट पर मुस्लिम सवा लाख, वैश्य वोटर करीब 70 हजार तो 40 हजार के करीब ब्राह्मण वोटर हैं। वहीं 35 हजार दलित वोटर और 20 हजार त्यागी वोटर भी निर्णायक साबित हो सकते हैं। यहां जाट बिरादरी और पंजाबी बिरादरी का भी वोट है।

वहीं मेरठ कैंट सीट पर वैश्य वोटरों की आबादी 90 हजार तो पंजाबी वोटरों की आबादी 60 हजार है। वहीं यहां दलित वोटरों की आबादी पचास हजार और मुस्लिम वोटरों की आबादी 30 हजार है। अन्य पिछड़ा वर्ग के 20 हजार वोट भी हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। वहीं 2012 में अस्तित्व में आई मेरठ दक्षिण सीट पर आधे से ज्यादा शहरी वोटर है। इस सीट पर सर्वाधिक मुस्लिम वोटर हैं और यहां अन्य पिछड़ा वर्ग के भी करीब 15 हजार वोट हैं। वहीं मेरठ की किठौर विधानसभा सीट पर भी 20 हजार अन्य पिछड़ा वर्ग की वोटर हैं। महाभारत काल की राजधानी रही हस्तिनापुर सीट भी मेरठ में ही आती है। इस सीट पर सबसे अधिक आबादी जाट वोटरों की है। वहीं सरधना सीट ठाकुर बाहुल्य वाली सीट है, लेकिन यहां पर भी जाटों की आबादी करीब 26 हजार है। अगर ठाकुर और जाट एक साथ आ जाएं तो किसी भी पार्टी के कैंडिडेट को जीत दिला सकते हैं। सिवालखास सीट पर भी जातीय समीकरण से ही हार-जीत तय होती आई है। इस सीट पर अन्य पिछड़ा वर्ग के 40 हजार वोटर किसी भी उम्मीदवार की किस्मत का फैसला करते हैं।

मेरठ में हाईकोर्ट बेंच, स्मार्ट सिटी में जाम, कूड़ा प्रबंधन, कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और गन्ना बकाया भुगतान जैसे अहम चुनावी मुद्दे हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार की तरफ से हजारों करोड़ रुपए के विकास कार्य कराने का भी दावा किया जा रहा है। दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस-वे, दिल्ली से हापुड़, मेरठ से बुलंदशहर तक का राष्ट्रीय राजमार्ग का काम बीजेपी सरकार में हुआ है। इसके अलावा हाईस्पीड ट्रेन की शुरुआत कराना, क्षेत्रीय हवाई सेवा, आकाशवाणी केंद्र निर्माण जैसे कई काम भी बीजेपी सरकार में हुए हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने मेरठ में मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का शिलान्यास किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेरठ में काली पटलन मंदिर में भी दर्शन-पूजन किया था। साफ है कि बीजेपी विकास और हिंदुत्व के नाम पर चुनाव मैदान में उतर रही है। वहीं समाजवादी पार्टी पिछड़े,जाट और मुस्लिम वोट बैंक को साधने में लगी है। इस इलाके में बीएसपी का भी परंपरागत वोट बैंक है। यहां जीत या हार का अंतर बेहद कम रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। अगर किसी भी खेमे के वोट बैंक में सेंध लग गई तो कांटे की टक्कर में उस पार्टी के कैंडिडेट की हार तय है।

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