देवघर: झारखंड में नगर निकाय चुनाव ने सियासी पारा बढ़ा दिया है. देवघर नगर निगम क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है. मेयर और वार्ड पार्षद पद के प्रत्याशी यहां घर-घर जाकर मतदाताओं को साधने में जुटे हैं, वहीं राजनीतिक दलों की सक्रियता ने चुनावी तस्वीर को और भी दिलचस्प बना दिया है. हालांकि राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर निकाय चुनाव को गैर दलगत घोषित किया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है.
प्रत्याशियों के सपोर्ट में सांसद निशिकांत दुबे
बीजेपी और कांग्रेस जैसे बड़े दल खुलकर या सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थित प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं. बीजेपी के वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से मेयर और पार्षद प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार करते नजर आ रहे हैं. वहीं कांग्रेस की तरफ से भी अपने प्रत्याशियों को समर्थन देने की बात कही जा रही है.
राजनीतिक दलों के खुले समर्थन से निष्पक्षता पर सवाल
इसी को बात लेकर कई निर्दलीय प्रत्याशियों में नाराजगी देखी जा रही है. उनका कहना है कि जब चुनाव दलगत आधार पर नहीं हो रहा है, तो राजनीतिक दलों का खुला समर्थन निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है. यदि चुनाव पार्टी सिंबल पर होता तो तस्वीर अलग ही होती.
निगम चुनाव में राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप उचित नहीं: मेयर प्रत्याशी बाबा बलियासे
मेयर प्रत्याशी बाबा बलियासे ने साफ कहा कि निगम चुनाव में राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप उचित नहीं है. उन्होंने बताया कि वे खुद कभी बीजेपी के सिपाही रहे हैं लेकिन पार्टी द्वारा किसी अन्य प्रत्याशी को समर्थन दिए जाने से उनकी लड़ाई अब सिर्फ एक उम्मीदवार से नहीं, बल्कि पूरी पार्टी से हो गई है, फिर भी उन्हें भरोसा है कि देवघर की जनता दलगत भावना से ऊपर उठकर मतदान करेगी.
जनता के बीच सक्रिय कार्यकर्ता की होती है जीत: प्रत्याशी सुधीर पासी
वार्ड संख्या 24 के पार्षद प्रत्याशी सुधीर पासी का कहना है कि हर प्रत्याशी किसी न किसी पार्टी के विचारधारा से जुड़ा होता है. निकाय चुनाव में एक ही दल के कई कार्यकर्ता मैदान में उतर जाते हैं लेकिन जीत उसी की होती है जो जनता के बीच सक्रिय और समर्पित रहता है. उनका मानना है कि पार्टी समर्थन से कमजोर कार्यकर्ता मजबूत तो दिख सकता है लेकिन असली ताकत जनता का विश्वास ही है.
काम के आधार पर जीते हैं वार्ड चुनाव: प्रत्याशी डोली देवी
पार्षद प्रत्याशी डोली देवी ने बताया कि वार्ड चुनाव काम के आधार पर जीते जाते हैं, न कि दलगत पहचान से. वे निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ रही हैं और पहले भी पार्षद रह चुकी हैं. उनके अनुसार, यदि उम्मीदवार में सेवा की भावना और जीतने का जज्बा हो तो पार्टी समर्थन का कोई खास महत्व नहीं रह जाता.
कौन सा प्रत्याशी किस विचारधारा के करीब?
वहीं मेयर प्रत्याशी रीता चौरसिया का नजरिया थोड़ा अलग है. उनका मानना है कि राजनीतिक दलों का समर्थन मतदाताओं के लिए मार्गदर्शक की तरह काम करता है. इससे लोगों को यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि कौन सा प्रत्याशी किस विचारधारा के करीब है.
चुनाव में ‘सपोर्ट पॉलिटिक्स’ का असर
गौरतलब है कि नगर निकाय चुनाव आधिकारिक रूप से गैर दलगत हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष राजनीतिक समर्थन ने चुनाव को पूरी तरह सियासी रंग दे दिया है. अब बड़ा सवाल यही है कि क्या मतदाता पार्टी की छाया देखकर वोट करेंगे या फिर स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत कार्यशैली को प्राथमिकता देंगे? देवघर में मुकाबला रोचक होता जा रहा है और आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि ‘सपोर्ट पॉलिटिक्स’ का असर कितना गहरा पड़ता है और जनता किसे अपना नेता चुनती है.





































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































