बलौदाबाजार: वनों को अग्नि जैसी आपदा से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बलौदाबाजार वनमंडल में एक महत्वपूर्ण पहल की गई. 13 फरवरी 2026 को देवपुर वन परिक्षेत्र स्थित देवपुर नेचर कैंप में वनमंडलस्तरीय वन अग्नि सुरक्षा एवं प्रबंधन कार्यशाला का आयोजन किया गया. यह कार्यशाला आगामी अग्नि सीज़न को ध्यान में रखते हुए एक समन्वित और जनभागीदारी आधारित रणनीति तैयार करने का प्रयास रही.
वनमंडल अधिकारी धम्मशील गणवीर के निर्देश और उपस्थिति में आयोजित इस कार्यशाला ने साफ संदेश दिया कि अब लक्ष्य केवल आग बुझाना नहीं, बल्कि आग लगने से पहले ही उसे रोकना है. वन विभाग ने इस बार संकल्प लिया है कि 15 फरवरी से 15 जून तक चलने वाले अग्नि सीजन 2026 में एक भी आगजनी की घटना न हो.
जनभागीदारी पर जोर, सामूहिक रणनीति की शुरुआत
कार्यशाला में ग्रामीणों, वन प्रबंधन समितियों के सदस्यों, जनप्रतिनिधियों, छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और वन अमले को एक मंच पर लाया गया. यह स्पष्ट किया गया कि वनाग्नि की समस्या केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, यदि समाज साथ नहीं आएगा तो जंगलों को पूरी तरह सुरक्षित रखना संभव नहीं होगा. देवपुर नेचर कैंप का प्राकृतिक वातावरण इस आयोजन के लिए उपयुक्त साबित हुआ. खुले मंच पर आयोजित सत्रों में वन अधिकारियों ने आग के कारणों, प्रभावों और रोकथाम के उपायों पर विस्तार से चर्चा की. ग्रामीणों से सीधे बात कर उनके अनुभव भी साझा किए गए.
कार्यशाला में बताया गया कि अधिकांश वनाग्नि की घटनाएं मानवजनित होती हैं. इनमें लापरवाही सबसे बड़ा कारण है. महुआ संग्रह के दौरान जमीन पर गिरे फूलों को साफ करने के लिए आग लगाना, खेतों में पराली या सूखी घास जलाना, जंगल किनारे बीड़ी-सिगरेट के अवशेष फेंक देना, जानबूझकर शिकार या अन्य गतिविधियों के लिए आग लगानै, ये सभी कारण जंगलों के लिए खतरा बनते हैं. विशेषज्ञों ने बताया कि एक छोटी सी चिंगारी भी सूखे मौसम में बड़े अग्निकांड का रूप ले सकती है. इसलिए सतर्कता ही सबसे प्रभावी उपाय है. समय पर सूचना और त्वरित कार्रवाई से नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है. वन अधिकारियों ने प्रेजेंटेशन के जरिए बताया कि आग केवल पेड़ों को नहीं जलाती, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है. वन्यजीवों का आवास नष्ट हो जाता है, पक्षियों के घोंसले जल जाते हैं, छोटे जीव-जंतु मर जाते हैं. आग से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत नष्ट होती है, जिससे मृदा की उर्वरता कम होती है. जल स्रोत सूखने लगते हैं और भूजल स्तर पर भी असर पड़ता है. विशेष रूप से यह बताया गया कि लगातार आग लगने से वन पुनर्जीवन की क्षमता घटती है और जैव विविधता पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है. इसलिए आग की रोकथाम केवल एक मौसमी कार्य नहीं, बल्कि दीर्घकालीन पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा है. कार्यशाला को केवल औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं रखा गया. विद्यार्थियों को भी इसमें सक्रिय भागीदारी का अवसर दिया गया. विभिन्न स्कूल और महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं के लिए नुक्कड़ नाटक और पेंटिंग प्रतियोगिता आयोजित की गई. नुक्कड़ नाटक के माध्यम से छात्रों ने वनाग्नि के कारणों और उसके दुष्परिणामों को प्रभावी ढंग से पेश किया. योगेश बरिहा ग्रुप (देवपुर) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. शासकीय कॉलेज लवन ने द्वितीय और यामिनी चौहान ग्रुप (देवपुर) ने तृतीय स्थान हासिल किया. पेंटिंग प्रतियोगिता में अनुपमा ठाकुर प्रथम, लवी मलाकी द्वितीय और सलीना ठाकुर तृतीय रहीं. विजेताओं को सम्मानित कर पुरस्कृत किया गया. कार्यक्रम में विभिन्न वन प्रबंधन समितियों को उनके उत्कृष्ट कार्य और सतर्कता के लिए सम्मानित किया गया. जिन समितियों ने पिछले वर्षों में आग की घटनाओं को रोकने में सक्रिय भूमिका निभाई, उन्हें विशेष रूप से सराहा गया. इससे अन्य समितियों को भी प्रेरणा मिली कि वे अपने क्षेत्र में अधिक सजग रहें. वन विभाग का मानना है कि स्थानीय समितियों की सक्रिय भागीदारी से ही वास्तविक नियंत्रण संभव है. गांव स्तर पर निगरानी, फायर लाइन की देखभाल और त्वरित सूचना तंत्र को मजबूत करना जरूरी है. कार्यशाला में उपवनमण्डलाधिकारी कसडोल अनिल वर्मा, अधीक्षक बारनवापारा अभ्यारण्य कृषानू चन्द्राकार, प्रशिक्षु एसीएफ प्रखर नायक, गुलशन साहू, श्वेता सिंह, वनक्षेत्रपाल कोठारी जीवन लाल साहू, वनक्षेत्रपाल देवपुर संतोष कुमार पैकरा सहित प्रशिक्षु वनक्षेत्रपाल और अन्य अधिकारी मौजूद रहे. वनरक्षक देवपुर परिसर अजीत ध्रुव ने कार्यक्रम का संचालन किया. बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, वन प्रबंधन समिति सदस्य, फायर वाचर, छात्र-छात्राएं और शिक्षक मौजूद रहे. सभी ने सामूहिक रूप से जंगलों की सुरक्षा का संकल्प लिया. वन विभाग द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार बलौदाबाजार वनमंडल में वर्ष 2021 में 257, वर्ष 2022 में 142, वर्ष 2023 में 72, वर्ष 2024 में 29 और वर्ष 2025 में 133 अग्नि घटनाएं दर्ज की गईं. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुछ वर्षों में वनाग्नि की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई, लेकिन पिछले वर्ष घटनाओं में फिर वृद्धि देखी गई. इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार ज्यादा सतर्कता और तकनीकी उपायों पर जोर दिया गया है. फायर लाइन कटाई, फायर वाचरों की तैनाती, त्वरित प्रतिक्रिया दल और आधुनिक उपकरणों के उपयोग से आग की घटनाओं को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है. वन विभाग ने बताया कि सैटेलाइट आधारित निगरानी, मोबाइल एप और नियंत्रण कक्ष के माध्यम से आग की सूचना तुरंत प्राप्त की जाती है. सूचना मिलते ही संबंधित क्षेत्र के अमले को अलर्ट किया जाता है. फायर वाचर और स्थानीय समिति सदस्य मिलकर प्रारंभिक स्तर पर आग को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं. अधिकांश घटनाओं में घास-फूस और सूखे पत्तों का जलना पाया गया, जिससे समय रहते बड़े नुकसान को रोका जा सका. हालांकि विभाग का लक्ष्य है कि ऐसी घटनाएं भी न हों. कार्यशाला के समापन पर वनमंडल अधिकारी धम्मशील गणवीर ने कहा “हमारा प्रयास केवल आग बुझाने तक सीमित नहीं है. हमें ऐसा वातावरण बनाना है, जहां पूरे अग्नि सीज़न में एक भी आगजनी की घटना न हो. यह तभी संभव है जब हर नागरिक स्वयं को जिम्मेदार समझे. उन्होंने ग्रामीणों, वन प्रबंधन समितियों, विद्यार्थियों और युवाओं से अपील की कि वे सतर्क रहें, आग लगते ही तुरंत सूचना दें और किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरतें. जंगल हमारी प्राकृतिक धरोहर हैं. इन्हें सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है.वनाग्नि के प्रमुख कारणों पर विस्तृत चर्चा
आग से होने वाले नुकसान की गंभीरता
नुक्कड़ नाटक और पेंटिंग के जरिए जनजागरूकता
उत्कृष्ट वन प्रबंधन समितियों का सम्मान
अधिकारियों और वन अमले की सक्रिय भागीदारी
पिछले वर्षों के आंकड़े और चुनौती
तकनीक और त्वरित कार्रवाई पर फोकस
लक्ष्य—शून्य अग्नि घटना



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