यह दौर बहुत घटना प्रधान है। अमेरिका और अन्य जगह विवादित प्रतिमाएं गिराई जा रही हैं। इतिहास की विभूतियों का नए सिरे से आकलन हो रहा है। ऐसे में मुझे इस बात को लेकर हैरानी है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां इस दौर और खुद हमारे बारे में क्या अनैतिक पाएंगी? आज के किस नायक को खारिज किया जाएगा? किसकी प्रतिमाओं को गिराया जाएगा? भविष्य की पीढ़ियां हमारे दामन पर अनैतिक धब्बों को लेकर क्या राय बनाएंगी? मेरे ख्याल से तो एक पहलू निश्चित रूप से पशुओं के प्रति हमारी क्रूरता से जुड़ा होगा। आधुनिक समाज फैक्ट्रियों में प्रोटीन उत्पादन पर निर्भर है। किफायती होने के साथ-साथ इससे प्रचुर मात्रा में उत्पादन संभव है। हालांकि इस प्रक्रिया में पशुओं को असहनीय पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ता है।
दुनिया पशु अधिकारों के लिए और अधिक संवेदनशील बनी
पिछले दो सौ वर्षों के दौरान दुनिया पशु अधिकारों के लिए और अधिक संवेदनशील बनी है। सामंतवादी यूरोप में तो पशु क्रूरता से जुड़े कई खेल प्रचलित रहे। हालांकि अब तमाम राज्य और देश पशु संरक्षण कानून बना रहे हैं। मैकडॉनल्ड जैसी कंपनी खास अंडों की ओर मुखातिब हो रही है। वहीं इस पर भी कानूनी बहस चल रही है कि क्या कुछ स्तनपायी प्राणियों को अदालत में मुकदमेबाजी के लिए खड़ा किया जा सकता है। कुछ अदालती मामलों में तो व्हेल और डॉल्फिन जैसे प्राणियों को भी वादी बनाया गया है। पोप फ्रांसिस कहते हैं कि पशु स्वर्ग में जाते हैं। तमाम लोग उनसे सहमति जताएंगे। वास्तव में स्वर्गलोक पशुओं के बिना सूना ही हो जाएगा। ऐसा नहीं कि लोग पशुओं से प्रेम नहीं करते। कई धनी परिवारों में पालतू कुत्ते को किसी गरीब परिवार के बच्चे से बेहतर सुविधाएं हासिल होती हैं। हालांकि यह सहूलियत उन तमाम फार्म एनिमल्स खासकर पॉल्ट्री उद्योग के पशुओं को नहीं मिल पातीं
पिछले वर्ष अमेरिका में बेरहमी से 9.3 अरब मुर्गे मारे गए
गत वर्ष अमेरिका में 9.3 अरब मुर्गे काटे गए। यानी प्रत्येक अमेरिकी के अनुपात में 28 मुर्गे। यह भी देख लीजिए कि उन्हें किस तरह मारा जाता है। सबसे पहले मुर्गों की टांगों को धातु से बांधा जाता है। फिर इलेक्ट्रिक बाथ दी जाती है। इसके बाद उनकी गर्दन उतारते हैं और उन्हें बेहद गर्म पानी में डुबोया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया बहुत करीने से चलती है। इसके बावजूद बंधन में बंधे होने के कारण कुछ मुर्गों की टांगें और पंख टूट जाते हैं। जब यह सिस्टम नाकाम हो जाता है तो वे आरी के आगे जद्दोजहद करते हैं। कई मुर्गे आरी से भी बच जाते हैं। कृषि विभाग ने खुद बताया कि पिछले साल 5,26,000 मुर्गों को ठीक से कत्ल नहीं किया जा सका और उनमें से कुछ को जिंदा उबाल दिया गया।
कसाईखाने के कमजोर रक्षा कवच वाले कर्मचारी कोरोना वायरस की गिरफ्त में आकर बीमार पड़ रहे हैं
किसी बच्चे को तो पक्षी के पंख तोड़ने पर सजा दी जा सकती है, लेकिन कॉरपोरेट अधिकारियों का अरबों की तादाद में पक्षियों को प्रताड़ित करने पर कुछ नहीं बिगड़ता। फैक्ट्री फार्मिंग अग्रिम मोर्चे पर तैनात मानव कर्मियों को भी नुकसान पहुंचा रही है। फिर चाहे मामूली भुगतान पाने वाले वे संघर्षरत किसान हों जो पशु को बड़ा करके कसाईखाने तक लाते हैं या फिर उन कत्लखानों में काम करने वाले कर्मचारी जिन्हें कमजोर रक्षा कवच हासिल होता है। अब वे कोरोना वायरस की गिरफ्त में आकर बीमार पड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में लोगों का रवैया बदल रहा है।
पशुओं के साथ व्यापक स्तर पर क्रूरता
वर्ष 2018 में करीब आठ प्रतिशत अमेरिकी युवाओं ने खुद को शाकाहारी बताया। उनकी तुलना में 55 साल की उम्र से अधिक वाले अमेरिकियों का आंकड़ा महज दो प्रतिशत था। दो साल पहले मैं खुद शाकाहारी बन गया हूं। हालांकि बेटी के आग्रह पर मछली खा लिया करता हूं। फिर भी मेरा यही मानना है कि नैतिक एवं पर्यावरणीय लिहाज से और मांसाहार के मुकाबले लगातार बढ़ते स्वादिष्ट शाकाहारी विकल्पों को देखते हुए आने वाली पीढ़ियां मांस का उपभोग कम करेंगी। साथ ही पशुओं के साथ व्यापक स्तर पर की जाने वाली क्रूरता को हमारी बेपरवाह स्वीकृति भी उन्हेंं हैरान करेगी।
आने वाली पीढ़ियोंं को तंगदिल रवैये पर राय बनाने को मजबूर करेगा
प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के दार्शनिक पीटर सिंगर ने मुझे बताया था कि आने वाली पीढ़ियां फैक्ट्री फार्म में पशुओं के प्रति हमारी क्रूरता को उसी नजरिये से देखेंगी जैसे हम रोमन खेलों में क्रूरता को देखते रहे हैं। उन्हें हैरानी होगी कि अरबों पशुओं के साथ हुए अत्याचार पर हम कैसे आंखें मूंदे रहे। गरीब देशों की समस्याओं के प्रति हमारी बेरुखी मेरे ख्याल से दूसरा ऐसा मसला होगा जो आने वाली पीढ़ियोंं को हमारे तंगदिल रवैये पर राय बनाने को मजबूर करेगा। दुनिया भर में 50 लाख से अधिक बच्चे इस साल डायरिया, कुपोषण और अन्य बीमारियों के कारण मौत के आगोश में समा जाएंगे। मुख्य रूप से अपनी विशिष्ट पहचान के कारण हम इन बच्चों को उनके हाल पर ही छोड़ देते हैं। वे हमारी प्राथमिकता में नहीं हैं।
केवल 5 प्रतिशत मुर्गे ही असमय मरते हैं
जब मैं ब्रॉइलर चिकंस के कारोबार में कुप्रबंधन की निंदा कर रहा हूं तो यह बताना उल्लेखनीय होगा कि केवल 5 प्रतिशत मुर्गे ही असमय मरते हैं। इसकी तुलना में सब-सहारा अफ्रीका में 7.8 प्रतिशत बच्चे 5 साल से पहले ही मर जाते हैं। यह आंकड़ा यूनिसेफ का है। ऐसे में क्रूर कृषि कारोबार से जुड़ी चिंताएं बेबी चिकंस को बचाने में उन सरोकारों से ज्यादा प्रभावी हो सकती हैं जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय अक्सर मानवीय शिशुओं के प्रति दिखाता है।
जलवायु परिवर्तन तीसरी ऐसी कसौटी होगी जिस पर भविष्य की पीढ़ियां हमें बहुत कड़ाई से कसेंगी
जलवायु परिवर्तन तीसरी ऐसी कसौटी होगी जिस पर भविष्य की पीढ़ियां हमें बहुत कड़ाई से कसेंगी। हमारी पीढ़ी की लापरवाही अत्यंत प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों का कारण बनेगी। बाढ़ और प्रचंड गर्म हवाओं का कहर बढ़ेगा। इससे यही तस्वीर बनेगी कि 21वीं सदी की शुरुआत का मानव इतना स्वार्थी रहा कि कार्बन उत्सर्जन घटाने को लेकर उसने छोटे-छोटे कदम उठाना भी गवारा नहीं समझा।
जलवायु परिवर्तन से निपटने में नाकामी
इन्हीं चिंताओं पर मेरे साथ संवाद में ब्राउन यूनिर्विसटी में भौतिकी के प्रोफेसर ब्रैड मार्स्टन ने कहा, ‘सौ वर्षों में हमारी पीढ़ी को 19वीं सदी के नस्लवादियों जैसा या उससे भी बदतर माना जाएगा। जलवायु परिवर्तन से निपटने में नाकामी इसकी वजह होगी जिसके कारण हम भविष्य की पीढ़ियों को विरासत में एक बदहाल ग्रह सौंपेंगे।’
मैं इतिहास की पुनर्समीक्षा और दिग्गजों के बुत हटाने के लिए तैयार हूं
इसीलिए मैं इतिहास की पुनर्समीक्षा और दिग्गजों के बुत हटाने के लिए तैयार हूं, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम अपनी नैतिक अदूरदर्शिता पर गहराई से विचार कर उसे दूर करने के प्रयास करें, क्योंकि इसके लिए अभी भी वक्त है।



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