रांची: राजधानी रांची से सटे सुगनू गांव में इन दिनों जो सबसे मजबूत तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, वह किसी चूल्हे के धुएं की नहीं, बल्कि हर घर के बाहर, हर चौखट, हर आंगन और छत पर जमा लकड़ियों के ऊंचे ढेर की है. गांव में कदम रखते ही नजर जहां भी जाती है, वहां लकड़ी का भंडार दिखाई देता है और यही इस गांव की असली कहानी कहता है.
जब शहरों में गैस सिलेंडर को लेकर मारामारी मची है, लोग कतारों में खड़े हैं, वहीं सुगनू गांव ने इस संकट से निपटने का अपना रास्ता खुद तैयार कर लिया है. यहां न कोई हड़बड़ी है और न ही किसी तरह की अफरा-तफरी. वजह साफ है, गांव के पास अब इतना लकड़ी का भंडार है कि आने वाले लंबे समय तक रसोई पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
दरअसल, गैस की बढ़ती कीमतों, रसोई गैस न मिलने की आशंका और अनियमित आपूर्ति ने गांव के लोगों को सतर्क कर दिया है. कभी सिलेंडर समय पर मिल रहा है, तो कभी हफ्तों इंतजार करना पड़ रहा है. इस अनिश्चितता ने ग्रामीणों को एक साथ सोचने पर मजबूर किया और यहीं से शुरू हुई लकड़ी इकट्ठा करने की पहल.
साल भर का जलावन के लिए स्टॉक शुरुआत धीरे-धीरे हुई, लेकिन जल्द ही यह पूरे गांव की सामूहिक तैयारी बन गई. लोगों ने आसपास के जंगलों से सूखी टहनियां, गिरे हुए पेड़ और बेकार पड़ी लकड़ियां इकट्ठा करनी शुरू कर दीं. हर दिन थोड़ा-थोड़ा जोड़ते हुए आज हालात यह हैं कि गांव के लगभग हर घर में सालभर के लिए जलावन जमा हो चुका है. सुगनू गांव में जहां घर के बाहर कदम रखते ही लकड़ियों का ढेर नजर आता है. किसी के दरवाजे के पास सलीके से सजाया गया है, तो कहीं छत पर कतार में रखा गया है. कई घरों में तो आंगन का बड़ा हिस्सा सिर्फ लकड़ी के भंडारण के लिए इस्तेमाल हो रहा है. चौक-चौराहों और गलियों में भी जगह-जगह लकड़ी के ढेर इस तैयारी की गवाही देते हैं. रसोई का पूरा सिस्टम अब गांव की रसोई का पूरा सिस्टम इसी पर टिक गया है. हर घर में लकड़ी का चूल्हा जल रहा है और सुबह से लेकर रात तक का खाना इसी पर बन रहा है. गैस कनेक्शन कई घरों में अब भी मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल बेहद सीमित हो गया है. लोगों का कहना है कि जब अपने पास पर्याप्त इंतजाम है, तो महंगे और अनिश्चित विकल्प पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है. लगातार किया गया लकड़ी इकट्ठा ग्रामीण बताते हैं कि उन्होंने यह तैयारी सिर्फ कुछ दिनों के लिए नहीं, बल्कि पूरे साल को ध्यान में रखकर की है. यही वजह है कि लकड़ी इकट्ठा करने का काम एक अभियान की तरह चला. परिवार का हर सदस्य इसमें शामिल हुआ और अब हर घर खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा है. गांव के इर्द-गिर्द है मौजूद जंगल, बावजूद लोग नहीं कटते हैं हरे-भरे पेड़ गांव के आसपास मौजूद जंगल इस पूरी व्यवस्था का आधार हैं. हालांकि ग्रामीण केवल सूखी लकड़ियां, गिरे हुए पेड़ या पहले से क्षतिग्रस्त पेड़ों को ही इकट्ठा करते हैं. हरे पेड़ों को काटने से बचा जाता है. इस तरह जरूरत और संसाधनों के बीच एक संतुलन बनाए रखा गया है. गांव के पास स्थित आर्मी कैंप के आसपास के इलाकों से भी लोग लकड़ी लाते हैं, जिससे उनके भंडार और मजबूत हुए हैं. फिलहाल गांव में लकड़ी इकट्ठा करने का काम लगभग पूरा हो चुका है और हर घर में इसका साफ असर दिख रहा है. शहरों में रसोई गैस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है एक तरफ शहरों में गैस सिलेंडर के लिए जद्दोजहद है, लंबी लाइनें, बढ़ती कीमतें और अनिश्चितता, तो दूसरी तरफ सुगनू गांव है, जहां हर चौखट पर सजी लकड़ियां इस बात का सबूत हैं कि यहां लोगों ने समस्या से पहले ही समाधान तैयार कर लिया है.


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