अमृतसर: मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध का सीधा असर अब भारत के फार्मा सैक्टर पर दिखाई देने लगा है। जरूरी दवाइयों की उत्पादन शृंखला डगमगा गई है, जिससे न सिर्फ दवाइयों की कमी पैदा हो रही है, बल्कि उनकी कीमतों में भी भारी वृद्धि दर्ज की जा रही है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कुछ जरूरी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट की कीमतें मात्र 15 दिनों में लगभग दोगुनी हो गई हैं। सबसे बड़ी चिंता जरूरी दवाइयों की उपलब्धता को लेकर बनी हुई है।
जानकारी के अनुसार पैरासिटामोल जैसे आम उपयोग वाले ए.पी.आई. की कीमत 250 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 425 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। इसके साथ ही देश में मौजूद 10-11 निर्माताओं द्वारा इसकी सप्लाई में भी कमी दर्ज की गई है। कई ए.पी.आई. कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया है या रोक दिया है, जिससे फार्मूलेटर कंपनियों के लिए दवाइयां तैयार करना मुश्किल हो रहा है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो बाजार में आवश्यक दवाइयों की भारी कमी हो सकती है।
फार्मा उत्पादन में उपयोग होने वाले ग्लिसरीन, आइसोप्रोपाइल अल्कोहल और सॉर्बिटोल जैसे सॉल्वेंट्स की कीमतों में भी 50 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। इनकी उपलब्धता भी कम हो गई है, जिससे उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ है। इसी तरह एल.डी.पी.आई. व एच.डी.पी.ई. ग्रैन्यूल्स की भी भारी कमी सामने आई है, जो दवाइयों की पैकेजिंग के लिए जरूरी है, जिनकी कीमतों में भी लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ौत्तरी हुई है।
जरूरी दवाइयों की कमी ने बढ़ाई चिंता
फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चर एसोसिएशन के राज्य वाइस प्रधान अमित कपूर ने बताया कि सबसे ज्यादा असर आवश्यक दवाइयों पर पड़ा है। पैरासिटामोल जैसे आम प्रयोग वाले ए.पी.आई. की कीमत पिछले 15 दिनों में 250 से बढ़कर 425 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। देश के 10-11 निर्माताओं द्वारा इसकी सप्लाई में कमी दर्ज की गई है, जिससे मार्किट में कमी का खतरा बढ़ गया है। कई ए.पी.आई. कंपनियां वित्तीय व सप्लाई समस्याओं कारण उत्पादन कम कर रही है या रोक रही है, यदि यह हालात जारी रहे तो फार्मूलेट कंपनियों के लिए दवाई तैयार करना मुश्किल हो जाएगा। सालवैंट्स में 50 प्रतिशत तक वृद्धि होने कारण उत्पादन महंगा हो गया है।
आयुर्वेदिक कच्चे माल की कीमतों में भी बढ़ौतरी
अमृतसर आयुर्वेदिक ड्रग्स मैन्युफैक्चर एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल ठुकराल ने बताया कि आयुर्वेदिक दवाइयों के कच्चे माल की कीमतें भी लगभग दोगुनी हो गई हैं। ईरान से आने वाले कच्चे माल की सप्लाई में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं। दवाइयों की पैकेजिंग से जुड़ी वस्तुएं भी इस संकट से बच नहीं सकती। ओरल लिक्विड के लिए इस्तेमाल होने वाली पी.ई.टी. बोतलें, इंजैक्शन के लिए ग्लास वायल्स और अन्य सामग्री की कीमतों में 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ौतरी दर्ज की गई है। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण निर्माताओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
कालाबाजारी रोकने के लिए केंद्र सरकार ले सख्त एक्शन
पंजाब कैमिस्ट एसोसिएशन के महासचिव मनमोहन सिंह ने कहा कि कच्चे माल कारण दवाओं के कुछ रेट में वृद्धि हुई है। भार सरकार को चाहिए कि दूसरे राज्यों की जंग का असर भारत के दवा बाजार पर न पड़े और मरीजों को भारी परेशानी का सामना न करना पड़े। फार्मा सेक्टर में लेबर की कमी भी एक बड़ी चिंता बन गई है। उद्योग से जुड़ी संस्थाओं ने अपील की है कि आवश्यक वस्तु एक्ट 1956 के तहत तुरंत सख्त कार्रवाई की जाए ताकि कालाबाजारी पर रोक लगाई जा सके और जरूरी दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।



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