चंडीगढ़: हरियाणा में लंबे समय से नियमितीकरण की आस लगाए बैठे करीब एक हजार कच्चे कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। माननीय उच्च न्यायालय (High Court) के कड़े निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावों पर आगामी छह महीने के भीतर विधिवत फैसला करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि यह आदेश सभी कर्मचारियों को एक साथ स्वतः नियमित करने का आदेश नहीं है, बल्कि प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत पात्रता और लागू नियमों के आधार पर ही निष्पक्ष निर्णय लिया जाएगा।
मानव संसाधन विभाग ने प्रदेश के सभी प्रशासनिक सचिवों, विभागाध्यक्षों, बोर्डों, निगमों और प्राधिकरणों के प्रबंध निदेशकों व मुख्य प्रशासकों, मंडलायुक्तों तथा उपायुक्तों को हाईकोर्ट के इन आदेशों का अक्षरशः और पूरी तरह पालन सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश दिए हैं।
📋 कर्मचारियों को देना होगा विस्तृत प्रतिवेदन, मदन सिंह मामले के सिद्धांतों पर होगी कार्रवाई
नियमों के तहत संबंधित कर्मचारियों को हाईकोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के महज दो सप्ताह के भीतर अपने संबंधित विभाग में एक विस्तृत प्रतिवेदन (Representation) जमा कराना होगा।
प्रतिवेदन में विवरण: इस आवेदन के साथ आदेश की प्रति लगाना अनिवार्य होगा, जिसमें कर्मचारियों को अपने नियमितीकरण के दावों और उससे जुड़े सभी तथ्यात्मक दस्तावेजों का पूरा ब्योरा देना होगा।
तय सिद्धांत: सरकार ने सभी विभागों को निर्देश दिए हैं कि वे ‘मदन सिंह मामले’ में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों के अनुसार ही प्रत्येक दावे पर कारण सहित स्पष्ट निर्णय लें। साथ ही, अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आदेश की जानकारी हर संबंधित कर्मचारी तक समय पर पहुँचे।
आपको बता दें कि सरकार की 1996, 2003 और 2014 की पुरानी नियमितीकरण नीतियों के तहत लाभ की मांग को लेकर कर्मचारियों द्वारा हाईकोर्ट में कुल 151 याचिकाएं दायर की गई थीं।🔍 पात्रता के आधार पर तय होंगे दावे, बिना ब्याज मिल सकता है बकाया लाभ
अदालत का रुख: गत 22 जनवरी 2025 को एकल पीठ ने 1996 की नीति के तहत लाभ देने से तो इनकार कर दिया था, लेकिन 2003 और 2011 की नीतियों के दायरे में आने वाले दावों पर अगले छह महीने के भीतर विचार कर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे।
बकाया लाभ और शर्तें: इन निर्देशों के तहत पात्र पाए जाने वाले कर्मचारियों को याचिका दायर करने की शुरुआती तारीख से बकाया वित्तीय लाभ मिल सकता है, हालांकि उस पर किसी प्रकार का ब्याज नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा, पात्र सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन में भी नियमानुसार संशोधन किया जा सकता है।
विभाग यह जांच करेगा कि संबंधित संस्थान पर 2003 की नीति लागू होती है या नहीं। यदि किसी कर्मचारी के संबंध में कोई प्रतिकूल निर्णय लिया जाता है, तो उसे अपना पक्ष रखने के लिए सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य होगा। हालांकि, जो कर्मचारी पहले से ही नियमित हो चुके हैं, उन्हें इन पुरानी नीतियों का नया लाभ नहीं मिल सकेगा।
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