भोपाल: देश में राजा-महाराजाओं और रियासतों के दौर में वन्यजीवों के शिकार के बाद उनके अवशेषों से तैयार की जाने वाली ट्रॉफियां अब वन विभाग के रडार पर आ गई हैं। मध्य प्रदेश के विभिन्न राजघरानों और निजी लोगों के पास ऐसी लगभग 350 ट्रॉफियां मौजूद हैं, जिनकी कानूनी वैधता और मालिकाना हक की नए सिरे से जांच की जा रही है। इन संरक्षित अवशेषों में बाघ और शेर के मुंह के सजावटी मॉडल, उनकी खाल, चीतल के सिर के मॉडल और बेशकीमती हाथी दांत से बनी मूर्तियां तक शामिल हैं। करीब 21 साल के लंबे अंतराल के बाद वन विभाग एक बार फिर इन सभी ट्रॉफियों का पुराना रिकॉर्ड खंगालने जा रहा है, जिसके तहत इनका नए सिरे से पंजीयन किया जाएगा और यह भी परखा जाएगा कि वर्तमान में इनके कब्जे से जुड़े दस्तावेज कानूनी रूप से कितने पुख्ता हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में मौजूद इन 350 के करीब ट्रॉफियों में से सबसे बड़ी संख्या इंदौर और भोपाल जिलों में है। ऐतिहासिक रूप से पुराने समय में रियासतों के राजा, महाराजा और अन्य प्रभावशाली लोग शिकार को अपनी वीरता की निशानी मानते थे और वन्यजीवों के अंगों को संरक्षित कर यादगार के रूप में अपने महलों व आवासों में सजाते थे। समय बीतने के साथ ये सभी ट्रॉफियां पारिवारिक विरासत के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथों में हस्तांतरित होती चली गईं। हालांकि, इस दौरान कई मूल मालिकों का निधन हो चुका है, लेकिन उनके परिवारों या उत्तराधिकारियों ने वन विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में अपने नाम से इनका नामांतरण या पंजीयन नहीं कराया है। वन विभाग अब पुराने अभिलेखों की गहन समीक्षा करके इन ट्रॉफियों के मौजूदा संरक्षकों और मालिकों का सटीक डेटा तैयार कर रहा है। विभाग का मुख्य जोर उन मामलों पर है जहां मूल मालिक की मृत्यु के बाद उनके परिजनों ने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए स्वामित्व अपने नाम नहीं कराया है। वन्यजीव संरक्षण नियमों के मुताबिक, किसी भी पंजीकृत ट्रॉफी के मूल मालिक की मृत्यु होने की स्थिति में उसके उत्तराधिकारी का यह दायित्व बनता है कि वह 90 दिनों के भीतर इसकी विधिवत सूचना वन विभाग को दे और विधिक रूप से नामांतरण प्रक्रिया पूरी करे। यदि 90 दिन की यह समयसीमा निकल चुकी है, तो ऐसे मामलों में स्वामित्व का निर्णय भोपाल स्थित वन्यजीव इकाई के प्रमुख अधिकारी दस्तावेजों की पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही करेंगे। प्रशासन ने स्पष्ट रूप से यह चेतावनी दी है कि केवल यह मौखिक दावा कर देना कि संबंधित वन्यजीव अवशेष उन्हें परिवार से विरासत में मिले हैं, मालिकाना हक के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा। इसके लिए उत्तराधिकारियों को ठोस और वैधानिक दस्तावेज पेश करने ही होंगे। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इन संरक्षित वन्यजीव अंगों पर किसका वैध नियंत्रण है और इनकी सुरक्षा व अभिरक्षा की जिम्मेदारी किसके पास है। इस नए पंजीयन अभियान के शुरू होने से इंदौर, भोपाल और प्रदेश के अन्य हिस्सों में इन ट्रॉफियों को सहेज कर रखने वाले लोगों को अपने कागजात दुरुस्त करने का अवसर मिलेगा, जिससे वर्षों से लटके उत्तराधिकार के मामलों में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।इंदौर और भोपाल में हैं सबसे अधिक ट्रॉफियां, विरासत के तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रहे वन्यजीवों के अवशेष
21 साल बाद क्यों पड़ रही है दोबारा रजिस्ट्रेशन की जरूरत? उत्तराधिकारियों को 90 दिन के भीतर विभाग को देनी होती है सूचना
केवल मौखिक या पारिवारिक विरासत का दावा करना नहीं होगा पर्याप्त, वैध दस्तावेज प्रस्तुत करना होगा अनिवार्य
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भोपाल: देश में राजा-महाराजाओं और रियासतों के दौर में वन्यजीवों के शिकार के बाद उनके अवशेषों से तैयार की जाने वाली ट्रॉफियां अब वन विभाग के रडार पर आ गई हैं। मध्य प्रदेश के विभिन्न राजघरानों और निजी लोगों के पास ऐसी लगभग 350 ट्रॉफियां मौजूद हैं, जिनकी कानूनी वैधता और मालिकाना हक की नए सिरे से जांच की जा रही है। इन संरक्षित अवशेषों में बाघ और शेर के मुंह के सजावटी मॉडल, उनकी खाल, चीतल के सिर के मॉडल और बेशकीमती हाथी दांत से बनी मूर्तियां तक शामिल हैं। करीब 21 साल के लंबे अंतराल के बाद वन विभाग एक बार फिर इन सभी ट्रॉफियों का पुराना रिकॉर्ड खंगालने जा रहा है, जिसके तहत इनका नए सिरे से पंजीयन किया जाएगा और यह भी परखा जाएगा कि वर्तमान में इनके कब्जे से जुड़े दस्तावेज कानूनी रूप से कितने पुख्ता हैं।
इंदौर और भोपाल में हैं सबसे अधिक ट्रॉफियां, विरासत के तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रहे वन्यजीवों के अवशेष
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में मौजूद इन 350 के करीब ट्रॉफियों में से सबसे बड़ी संख्या इंदौर और भोपाल जिलों में है। ऐतिहासिक रूप से पुराने समय में रियासतों के राजा, महाराजा और अन्य प्रभावशाली लोग शिकार को अपनी वीरता की निशानी मानते थे और वन्यजीवों के अंगों को संरक्षित कर यादगार के रूप में अपने महलों व आवासों में सजाते थे। समय बीतने के साथ ये सभी ट्रॉफियां पारिवारिक विरासत के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथों में हस्तांतरित होती चली गईं। हालांकि, इस दौरान कई मूल मालिकों का निधन हो चुका है, लेकिन उनके परिवारों या उत्तराधिकारियों ने वन विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में अपने नाम से इनका नामांतरण या पंजीयन नहीं कराया है।
21 साल बाद क्यों पड़ रही है दोबारा रजिस्ट्रेशन की जरूरत? उत्तराधिकारियों को 90 दिन के भीतर विभाग को देनी होती है सूचना
वन विभाग अब पुराने अभिलेखों की गहन समीक्षा करके इन ट्रॉफियों के मौजूदा संरक्षकों और मालिकों का सटीक डेटा तैयार कर रहा है। विभाग का मुख्य जोर उन मामलों पर है जहां मूल मालिक की मृत्यु के बाद उनके परिजनों ने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए स्वामित्व अपने नाम नहीं कराया है। वन्यजीव संरक्षण नियमों के मुताबिक, किसी भी पंजीकृत ट्रॉफी के मूल मालिक की मृत्यु होने की स्थिति में उसके उत्तराधिकारी का यह दायित्व बनता है कि वह 90 दिनों के भीतर इसकी विधिवत सूचना वन विभाग को दे और विधिक रूप से नामांतरण प्रक्रिया पूरी करे। यदि 90 दिन की यह समयसीमा निकल चुकी है, तो ऐसे मामलों में स्वामित्व का निर्णय भोपाल स्थित वन्यजीव इकाई के प्रमुख अधिकारी दस्तावेजों की पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही करेंगे।
केवल मौखिक या पारिवारिक विरासत का दावा करना नहीं होगा पर्याप्त, वैध दस्तावेज प्रस्तुत करना होगा अनिवार्य
प्रशासन ने स्पष्ट रूप से यह चेतावनी दी है कि केवल यह मौखिक दावा कर देना कि संबंधित वन्यजीव अवशेष उन्हें परिवार से विरासत में मिले हैं, मालिकाना हक के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा। इसके लिए उत्तराधिकारियों को ठोस और वैधानिक दस्तावेज पेश करने ही होंगे। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इन संरक्षित वन्यजीव अंगों पर किसका वैध नियंत्रण है और इनकी सुरक्षा व अभिरक्षा की जिम्मेदारी किसके पास है। इस नए पंजीयन अभियान के शुरू होने से इंदौर, भोपाल और प्रदेश के अन्य हिस्सों में इन ट्रॉफियों को सहेज कर रखने वाले लोगों को अपने कागजात दुरुस्त करने का अवसर मिलेगा, जिससे वर्षों से लटके उत्तराधिकार के मामलों में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।


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