संसद का स्पेशल सत्र 16 से 18 अप्रैल तक चलेगा. इसको लेकर सियासत का पारा हाई है. केंद्र सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 2029 तक लागू करने के मिशन पर है लेकिन रास्ते में सबसे बड़ा सवाल परिसीमन और सीटों का नया गणित है. इस बिल में एक तरफ 33% महिला आरक्षण तो दूसरी तरफ राज्यों के बीच सीटों का संतुलन बनाना चुनौती है यानी इस बिल में नारी शक्ति बनाम लोकसभा क्षेत्रों का री-डिजाइन मुख्य विषय है. तीन दिन का ये सत्र छोटा जरूर है मगर इसका असर बड़ा होगा.
सरकार 2023 में पास ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को अब बंगाल और तमिलनाडु चुनाव से पहले तेजी से लाना चाहती है. मौजूदा नियमों के मुताबिक, ये कानून 2027 की जनगणना और उसके बाद परिसीमन के बाद लागू होना था. मगर सरकार ने अब इंतजार न करने का फैसला किया है. इसके लिए तीन बिल लाए जा रहे हैं. संविधान संशोधन, परिसीमन बिल और यूनियन टेरिटरी संशोधन बिल. मतलब अब 2034 का इंतजार नहीं करना होगा. यह आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनावों से ही लागू हो सकता है.
संसद का नक्शा भी बदलेगा और सियासत का चेहरा भी
विधेयक में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर करीब 850 तक ले जाने का प्रस्ताव है. इसमें करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होगा. मतलब साफ है इस बिल से संसद का नक्शा भी बदलेगा और सियासत का चेहरा भी. इसमें सबसे बड़ा ट्विस्ट ये है कि 2027 की बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की तैयारी है क्योंकि बिल में साफ लिखा है आखिरी जनगणना परिसीमन का आधार रहेगा ताकि 2029 से ही महिला आरक्षण लागू किया जा सके. 33% आरक्षण, SC-ST महिलाओं को इसी में हिस्सा, 15 साल की अवधि और सीटों का रोटेशन.
लोकसभा में NDA के पास करीब 292-293 सांसद हैं लेकिन संविधान संशोधन के लिए चाहिए विशेष बहुमत. अगर पूरा सदन मौजूद रहा तो करीब 362 वोट जरूरी होंगे यानि सरकार को करीब 70 अतिरिक्त वोट चाहिए. राज्यसभा में भी तस्वीर आसान नहीं है. करीब 141 सीटें NDA के पास है लेकिन 164 के आंकड़े से दूर यानि सरकार को बाहर के दलों का समर्थन चाहिए और विपक्ष को समय पर ऐतराज है.अब सबसे अहम नंबर गेम!
यहीं से असली घमासान शुरू होता है. मुद्दा सिर्फ महिला आरक्षण का नहीं है बल्कि पावर बैलेंस का है. सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का नया फॉर्मूला चाहती है लेकिन दक्षिण भारत के राज्य- तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक पूरी तरह अलर्ट पर हैं. उनका तर्क है कि जनसंख्या कंट्रोल हमने किया और अब नुकसान भी हमें?
डर ये कि नई सीटों में उत्तर भारत मजबूत होगा और दक्षिण का राजनीतिक वजन कम. इसलिए सर्वदलीय बैठक की मांग की गई है और साफ चेतावनी भी दी गई है कि बिना सहमति आगे बढ़े, तो विरोध तय है. विपक्ष का स्टैंड साफ है कि महिला आरक्षण का समर्थन है लेकिन परिसीमन के नाम पर पावर शिफ्ट मंजूर नहीं. कांग्रेस समेत कई दल सवाल उठा रहे हैं कि क्या महिला आरक्षण के बहाने सियासी नक्शा बदला जा रहा है? लेकिन सरकार का जवाब है कि ये आधी आबादी को उनका हक देने का ऐतिहासिक मौका है. दावा किया जा रहा है कि 2029 तक महिला आरक्षण लागू होगा और किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा.
अब नजरें संसद पर
16-17 अप्रैल को लोकसभा और 18 अप्रैल को राज्यसभा में इस पर चर्चा होगी. महिला आरक्षण का भविष्य और सियासत का नया गणित करीब 25-28 घंटे की बहस में तय होगा. सरकार के लिए ये ‘नारी शक्ति’ का बड़ा दांव तो विपक्ष के लिए ‘परिसीमन’ फेडरल बैलेंस की लड़ाई बन गई है. सवाल वही है कि क्या सहमति बनेगी या टकराव ही हेडलाइन बनेगा क्योंकि इस बार मामला सिर्फ सीटों का नहीं बल्कि सत्ता के संतुलन और लोकतंत्र के डिजाइन का है.
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