खंडवा। आमतौर पर भक्त मंदिर जाकर देवी-देवताओं के दर्शन करते हैं, लेकिन निमाड़ की लोक देवी ‘धज माता’ की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। माघ माह के पावन अवसर पर धज माता खंडवा के खड़कपुरा स्थित अपनी ‘ठान’ (स्थान) से निकलकर 365 गांवों के भ्रमण पर निकलती हैं। यह एक ऐसी दुर्लभ परंपरा है, जहां देवी स्वयं चलकर भक्तों के द्वार पहुंचती हैं।
500 वर्षों से जारी है परंपरा यह परंपरा पिछले पांच सौ सालों से निरंतर जारी है। धज माता के अनन्य उपासक कमल कनाडे (ग्राम खेड़ीकित्ता) ने बताया कि आजादी से पूर्व राजाओं के संरक्षण में इस पूजा का विशेष महत्व था। उस समय इस पूजा के बदले जमींदारों और मालगुजारों को लगान में छूट भी दी जाती थी। वर्तमान में भी ग्राम के मुखिया और जमींदार परिवारों में देवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
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100 मीटर कपड़े से होता है माता का श्रृंगार माता का श्रृंगार माघ माह में विशेष मुहूर्त देखकर किया जाता है। खड़कपुरा स्थित भारुंड पटेल परिवार की ठान पर ‘ठवल्या’ और ‘भगत’ पहुंचकर करीब 100 मीटर कपड़े से माता का भव्य श्रृंगार करते हैं। गंगाजल से स्नान, हल्दी लेप और कुमकुम-चावल से पूजन के बाद यह यात्रा शुरू होती है। यह यात्रा महाशिवरात्रि पर पचमढ़ी के बड़ा महादेव या चारुआ स्थित गुप्तेश्वर महादेव पहुंचकर संपन्न होती है।
ढाक, सिंगाड़ और नैतिक शिक्षा का संगम यात्रा के दौरान भगत विशेष वेशभूषा में ढाक और सिंगाड़ बजाकर नृत्य और गायन करते हैं। 80 वर्षीय भगवान कनाडे ने बताया कि इन गीतों में शिव-गौरा के भजन, देव भिलट की कथा, राजा हरिश्चंद्र और नानी बाई का मायरा जैसी कथाएं सुनाई जाती हैं, जिनसे नई पीढ़ी को नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती है।
परंपरा का निर्वाह कर रहे सेवादार माता की उत्पत्ति पहले मंडलोई परिवार में हुई थी, जिसके बाद भारुंड पटेल परिवार में ठान बनी। नागचून और पांझरिया के कनाडे परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी माता को कंधों पर धारण कर भ्रमण कराने की सेवा दे रहे हैं। इस दल में मायाराम कनाडे, चेतराम कनाडे, सुखदेव कनाडे, रूपचंद हिरवे और लखन हिरवे जैसे सेवादार पूरी निष्ठा से शामिल हैं।



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