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ममता दीदी को असहज करेगा कांग्रेस का ‘अधीर’ दांव, बंगाल चुनाव में त्रिकोणीय होगी लड़ाई

नई दिल्‍ली। संसद ही नहीं राजनीतिक गोलबंदी के लिहाज से भी विपक्षी एकता की लंबे समय से कसरत कर रही कांग्रेस ने अधीर रंजन चौधरी को पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्‍यक्ष बनाकर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को सियासी रूप से असहज करने की पृष्‍ठभूमि तैयार कर दी है। बंगाल की राजनीति में ममता के सबसे मुखर विरोधियों में गिने जाने वाले अधीर के हाथ में पार्टी की कमान सौंपे जाने से यह लगभग साफ हो गया है कि राष्‍टीय स्‍तर पर मजबूत विपक्षी गोलबंदी बनाने के प्रयासों को सिरे चढाना कांग्रेस के लिए अब और भी मुश्किल होगा।

लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के अहम पद पर होने के बावजूद अधीर को बंगाल कांग्रेस की कमान सौंपे जाने के पार्टी हाईकमान के फैसले से यह भी साफ है कि अगले साल होने वाले राज्‍य विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस अपनी सियासत बचाने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी। कांग्रेस की यह रणनीति स्‍वाभाविक रुप से ममता बनर्जी को सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचा सकती है। राज्‍य में भाजपा की मजबूत चुनौती के मददेनजर भाजपा विरोधी वोट बैंक में एक सीमा से ज्‍यादा बिखराव तृणमूल की चुनावी सेहत के लिए ठीक नहीं आंका जा रहा है। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बंगाल में जिस तरह 18 लोकसभा सीटें जीतकर राजनीतिक विशलेषकों को हैरत में डाल दिया था उसके बाद से ही ममता बनर्जी सूबे में अपनी सियासी जमीन बचाने की कसरत में लगी हुई हैं।

ममता-भाजपा की लडाई को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश 

बंगाल में भाजपा की इस चुनौती को देखते हुए कांग्रेस और टीएमसी के कुछ नेताओं ने तो लोकसभा चुनाव के बाद दोनों पार्टियों के बीच मजबूत गठबंधन की वकालत भी की थी। हालांकि अधीर रंजन चौधरी समेत पार्टी के बड़े धड़े ने इसका विरोध किया था। अब हाईकमान ने अधीर को ही सूबे के संगठन की कमान सौंप दी है तो साफ है कि वे ममता के खिलाफ अपनी सियासी जंग को और तेज करेंगे। दीदी के खिलाफ अधीर बेहद सख्‍त निजी हमले करने के लिए भी जाने जाते हैं। बंगाल की चुनावी कमान अधीर को सौंपे जाने के बाद यह भी लगभग तय माना जा रहा कि सूबे में कांग्रेस और वामदलों के बीच चुनावी गठबंधन होगा। इससे यह भी साफ है कि बंगाल चुनाव में ममता-भाजपा की लडाई को कांग्रेस-वामदल त्रिकोणीय बनाने की पूरी कोशिश करेंगे जिसका नुकसान टीएमसी को हो सकता है।

विपक्षी एकता की गुंजाइश कम

ऐसे में देशव्‍यापी विपक्षी एकता की कांग्रेस की कोशिशें इसकी सियासी छाया से दूर रहेंगी इसकी गुंजाइश कम ही दिखती है। कम से कम मई 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव तक तो इसकी संभावना नजर नहीं आ रही। अधीर से तृणमूल कांग्रेस की नाराजगी मौजूदा लोकसभा के अब तक के सवा साल के कार्यकाल में भी पूरी तरह नजर आयी है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के नाते अधीर की अगुआई को टीएमसी सदस्‍यों ने कभी तवज्‍जो नहीं दी है और इसीलिए सदन में अधिकांश मौकों पर विपक्षी एकजुटता नदारद नजर आयी है।

यह खबर आपको कैसी लगी?

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नई दिल्‍ली। संसद ही नहीं राजनीतिक गोलबंदी के लिहाज से भी विपक्षी एकता की लंबे समय से कसरत कर रही कांग्रेस ने अधीर रंजन चौधरी को पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्‍यक्ष बनाकर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को सियासी रूप से असहज करने की पृष्‍ठभूमि तैयार कर दी है। बंगाल की राजनीति में ममता के सबसे मुखर विरोधियों में गिने जाने वाले अधीर के हाथ में पार्टी की कमान सौंपे जाने से यह लगभग साफ हो गया है कि राष्‍टीय स्‍तर पर मजबूत विपक्षी गोलबंदी बनाने के प्रयासों को सिरे चढाना कांग्रेस के लिए अब और भी मुश्किल होगा।

लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के अहम पद पर होने के बावजूद अधीर को बंगाल कांग्रेस की कमान सौंपे जाने के पार्टी हाईकमान के फैसले से यह भी साफ है कि अगले साल होने वाले राज्‍य विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस अपनी सियासत बचाने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी। कांग्रेस की यह रणनीति स्‍वाभाविक रुप से ममता बनर्जी को सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचा सकती है। राज्‍य में भाजपा की मजबूत चुनौती के मददेनजर भाजपा विरोधी वोट बैंक में एक सीमा से ज्‍यादा बिखराव तृणमूल की चुनावी सेहत के लिए ठीक नहीं आंका जा रहा है। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बंगाल में जिस तरह 18 लोकसभा सीटें जीतकर राजनीतिक विशलेषकों को हैरत में डाल दिया था उसके बाद से ही ममता बनर्जी सूबे में अपनी सियासी जमीन बचाने की कसरत में लगी हुई हैं।

ममता-भाजपा की लडाई को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश 

बंगाल में भाजपा की इस चुनौती को देखते हुए कांग्रेस और टीएमसी के कुछ नेताओं ने तो लोकसभा चुनाव के बाद दोनों पार्टियों के बीच मजबूत गठबंधन की वकालत भी की थी। हालांकि अधीर रंजन चौधरी समेत पार्टी के बड़े धड़े ने इसका विरोध किया था। अब हाईकमान ने अधीर को ही सूबे के संगठन की कमान सौंप दी है तो साफ है कि वे ममता के खिलाफ अपनी सियासी जंग को और तेज करेंगे। दीदी के खिलाफ अधीर बेहद सख्‍त निजी हमले करने के लिए भी जाने जाते हैं। बंगाल की चुनावी कमान अधीर को सौंपे जाने के बाद यह भी लगभग तय माना जा रहा कि सूबे में कांग्रेस और वामदलों के बीच चुनावी गठबंधन होगा। इससे यह भी साफ है कि बंगाल चुनाव में ममता-भाजपा की लडाई को कांग्रेस-वामदल त्रिकोणीय बनाने की पूरी कोशिश करेंगे जिसका नुकसान टीएमसी को हो सकता है।

विपक्षी एकता की गुंजाइश कम

ऐसे में देशव्‍यापी विपक्षी एकता की कांग्रेस की कोशिशें इसकी सियासी छाया से दूर रहेंगी इसकी गुंजाइश कम ही दिखती है। कम से कम मई 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव तक तो इसकी संभावना नजर नहीं आ रही। अधीर से तृणमूल कांग्रेस की नाराजगी मौजूदा लोकसभा के अब तक के सवा साल के कार्यकाल में भी पूरी तरह नजर आयी है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के नाते अधीर की अगुआई को टीएमसी सदस्‍यों ने कभी तवज्‍जो नहीं दी है और इसीलिए सदन में अधिकांश मौकों पर विपक्षी एकजुटता नदारद नजर आयी है।

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