स्वास्थ्य विशेषज्ञ हमेशा कहते हैं कि “मां का दूध बच्चे का पहला टीका होता है।” यह कथन पूर्णतः वैज्ञानिक और सत्य है।
प्रसव (Delivery) के तुरंत बाद मां के स्तन से निकलने वाला गाढ़ा सुनहरे रंग का तरल, जिसे ‘कोलोस्ट्रम’ (Colostrum) कहा जाता है, पोषक तत्वों और एंटीबॉडीज से भरपूर होता है। यह नवजात शिशु को ठीक उसी समय प्राकृतिक सुरक्षा चक्र प्रदान करता है, जब उसके पास स्वयं की कोई प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) नहीं होती। मां का दूध नवजात शिशु के समग्र स्वास्थ्य के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसी के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 1 से 7 अगस्त के मध्य विश्व स्तर पर ‘ब्रेस्टफीडिंग वीक’ (World Breastfeeding Week) का आयोजन किया जाता है।
📜 1992 में हुई थी ‘ब्रेस्टफीडिंग वीक’ की शुरुआत, WABA, WHO और UNICEF की पहल
विश्व स्तनपान सप्ताह का आयोजन पहली बार वर्ष 1992 में किया गया था।
इसकी शुरुआत ‘वर्ल्ड अलायंस फॉर ब्रेस्टफीडिंग एक्शन’ (WABA) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के साथ मिलकर की थी। इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य माताओं को यह समझाना है कि शिशु के संपूर्ण मानसिक और शारीरिक विकास के लिए मां का दूध कितना अपरिहार्य है। वर्तमान समय में कई माताएं डिब्बाबंद या पाउडर वाले दूध (Formula Milk) का सहारा लेने लगी हैं, जिससे शिशु को आवश्यक प्राकृतिक पोषक तत्व और एंटीबॉडीज नहीं मिल पाते।
🧬 वैज्ञानिक दृष्टिकोण और कोलोस्ट्रम: बच्चे की जरूरत के हिसाब से खुद को ढालता है मां का दूध
स्तनपान की जैविक प्रक्रिया अत्यंत अनूठी और स्थिति के अनुसार परिवर्तनशील होती है।
मां का दूध कोई एक जैसा स्थिर फॉर्मूला नहीं है; बल्कि हर बार दूध पिलाने के दौरान इसका रासायनिक संयोजन बदलता रहता है और यह शिशु की तात्कालिक आवश्यकता के अनुसार स्वतः ढल जाता है। विशेष रूप से शुरुआती कोलोस्ट्रम में एंटीबॉडीज की प्रचुर मात्रा होती है, जो मां के इम्यून इतिहास से सीधे शिशु में स्थानांतरित होती हैं। शुरुआती 6 महीनों तक केवल स्तनपान करने वाले बच्चे डायरिया, निमोनिया और सांस के गंभीर संक्रमण जैसी जानलेवा बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं।
🌸 मां और बच्चे दोनों के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ, कई गंभीर बीमारियों का खतरा होता है कम
स्तनपान कराने के लाभ केवल शिशु तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह मां के स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षा कवच बनता है।
स्तनपान कराने से मां के शरीर में ‘ऑक्सीटोसिन’ (Oxytocin) नामक हार्मोन का स्राव होता है, जो प्रसव के पश्चात गर्भाशय (Uterus) को पुनः अपने सामान्य आकार में लाने और ब्लीडिंग को नियंत्रित करने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त, नियमित स्तनपान कराने से माताओं में ब्रेस्ट कैंसर, ओवरी का कैंसर, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोगों का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है। यदि शुरुआत में बच्चे के मुंह से निप्पल पकड़ने (Latch) में कोई समस्या आती है, तो उसे सही मार्गदर्शन से ठीक किया जा सकता है।
🌿 आयुर्वेद के अनुसार ‘अमृत’ है मां का दूध, ‘रस धातु’ से होता है इसका निर्माण
प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में नवजात शिशु और मां दोनों के लिए स्तनपान के लाभों को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।
आयुर्वेद के अनुसार, मां का दूध ‘अमृत’ के समान होता है और यह ‘रस धातु’ से निर्मित होता है, जो शरीर को पोषण देने वाला मुख्य ऊतक है। प्रसिद्ध आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. चंचल शर्मा के अनुसार, धात्री (स्तनपान कराने वाली मां) का खान-पान, जीवनशैली, मानसिक स्थिति और शारीरिक दोषों का सीधा प्रभाव दूध की गुणवत्ता पर पड़ता है। संतुलित और पौष्टिक आहार माताओं के शरीर को प्रसव के बाद रिकवर करने और प्रचुर मात्रा में दूध के निर्माण में मदद करता है।
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