छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बेहद दिलचस्प और अनोखा मामला सामने आया है, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। हालांकि देश में विजयादशमी यानी रावण दहन में अभी वक्त है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसकी चर्चाएं अभी से जोर पकड़ चुकी हैं। इसकी मुख्य वजह कोई राजनीतिक आयोजन या प्रशासनिक तैयारी नहीं, बल्कि रावण के कथित ‘मानवाधिकार’ से जुड़ी एक अनोखी शिकायत है। यह मामला इतना दिलचस्प था कि चलते-चलते सीधे छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग तक जा पहुंचा। हैरान करने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता ने यह सवाल उठाया कि जब हर साल रावण का पुतला जलाया जाता है, तो क्या यह उसके मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं है? और बात यहीं पर खत्म नहीं हुई, इसके आगे उसने यह भी सवाल कर दिया कि आखिर दुर्योधन का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता?
📜 रावण के मानवाधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग में पहुंची अजीबोगरीब शिकायत
रायपुर से सामने आया यह पूरा प्रकरण अपने आप में बेहद अनूठा है। छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग के समक्ष एक ऐसी शिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें सीधे तौर पर रावण के मानवाधिकारों का मुद्दा उठाया गया। यानी जिस पौराणिक पात्र रावण का हर साल पुतला फूंककर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वही रावण अब मानवाधिकार आयोग की चौखट तक पहुंच गया। आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष गिरिधारी नायक के अनुसार, उनके पास हर रोज बड़ी संख्या में अलग-अलग तरह की गंभीर शिकायतें आती हैं। लगभग 74 हजार से अधिक मामलों के बीच कई बार ऐसे आवेदन भी सामने आ जाते हैं, जिनका विषय सीधे तौर पर आयोग के कानूनी अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर होता है। इसी कड़ी में रावण के मानवाधिकार से जुड़ी इस शिकायत ने सभी को अचरज में डाल दिया।
❓ शिकायतकर्ता का तर्क: क्या रावण के मानवाधिकारों का हो रहा है हनन, और दुर्योधन पर क्यों नहीं उठते सवाल?
शिकायतकर्ता का मुख्य सवाल यह था कि चूंकि हर साल दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है, तो क्या यह कानूनी और नैतिक रूप से उसके मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए? यह सवाल सुनने में भले ही काफी असामान्य लगे, लेकिन शिकायतकर्ता ने इसे बाकायदा अधिकारों के दृष्टिकोण से आयोग के समक्ष रखा। यानी हमारी सदियों पुरानी दशहरे की परंपरा को पहली बार किसी ने ‘पुतले के अधिकारों’ के चश्मे से देखने की पुरजोर कोशिश की। हालांकि, आयोग ने इस पर सीधा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि रावण कोई इंसान यानी मानव नहीं था, इसलिए यह मामला मानवाधिकार आयोग के कानूनी दायरे में नहीं आता। आयोग ने साफ किया कि मानवाधिकार कानून केवल जीवित इंसानों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए बने हैं, पौराणिक कथाओं के पात्रों या उनके पुतलों के लिए नहीं। लेकिन इसके बावजूद शिकायतकर्ता की जिज्ञासा शांत नहीं हुई और उसने दूसरा बड़ा सवाल दाग दिया कि अगर रावण का पुतला जलाया जाता है, तो फिर दुर्योधन का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता? उसके तर्क के अनुसार दुर्योधन को तो रावण से भी बड़ा पापी माना जाता है, फिर उसके दहन की परंपरा समाज में क्यों नहीं है?
⚖️ धार्मिक परंपराओं और आयोग की भूमिका: उचित मंच पर जाने की दी गई सलाह
इस पूरे मामले ने रावण के पुतले तक सीमित न रहकर रावण और दुर्योधन दोनों से जुड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए। शिकायतकर्ता ने अप्रत्यक्ष रूप से यह बात रखी कि अगर बुराई के प्रतीक के तौर पर किसी का पुतला जलाना ही है, तो फिर बुराई के अन्य बड़े प्रतीकों के साथ अलग और भेदभावपूर्ण व्यवहार क्यों किया जाता है? मानव अधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष के मुताबिक, शिकायतकर्ता को बेहद शालीनता से यह समझाया गया कि इस तरह के विषय आयोग के क्षेत्राधिकार में नहीं आते हैं और यदि उसे इस पर कोई विधिक या वैचारिक मंथन चाहिए, तो उसे किसी उचित और संबंधित मंच का रुख करना चाहिए। आयोग ने इस मामले को कानूनी पचड़े में डालने के बजाय साफ कर दिया कि धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े ऐसे अनूठे सवालों के लिए अलग प्रक्रियाएं होती हैं। बहरहाल, दशहरे से काफी पहले शुरू हुई इस बहस ने यह साबित कर दिया है कि हमारे देश में परंपराओं को देखने और उस पर सवाल उठाने के नजरिए लगातार बदलते जा रहे हैं।
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