मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महाकुंभ से चर्चा में आई मोनालिसा भोंसले के जन्म प्रमाण पत्र और उनकी शादी से जुड़े बहुचर्चित विवाद में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने उस प्रशासनिक आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसके जरिए मोनालिसा के पहले जारी किए गए जन्म प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया गया था और जन्मतिथि में बदलाव किया गया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति के जन्म प्रमाण पत्र में संशोधन करने या उसे निरस्त करने से पहले संबंधित पक्ष (मोनालिसा) को प्रभावी रूप से अपनी बात रखने का अवसर (सुनवाई का मौका) दिया जाना कानूनी रूप से अनिवार्य था।
📄 क्या है पूरा जन्मतिथि विवाद? वर्ष 2025 के पहले प्रमाण पत्र में दर्ज थी 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि
यह पूरा कानूनी विवाद मोनालिसा भोंसले के जन्म प्रमाण पत्र में दर्ज जन्मतिथि को लेकर चल रहा है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2025 में जारी किए गए पहले जन्म प्रमाण पत्र में उनकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 दर्ज की गई थी, जिसके समर्थन में उनकी मां का शपथ पत्र भी लगाया गया था। इसके अलावा उनके आधार कार्ड में भी यही जन्मतिथि दर्ज थी। हालांकि, बाद में अस्पताल के रिकॉर्ड के आधार पर जन्मतिथि बदलकर 30 दिसंबर 2009 कर दी गई और पुराने प्रमाण पत्र को खारिज कर दिया गया। इसी प्रशासनिक कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने माना कि बिना उचित सुनवाई के प्रमाण पत्र रद्द करना सही नहीं था, हालांकि अदालत ने यह तय नहीं किया है कि वास्तविक जन्मतिथि कौन सी है, बल्कि इसे कानून के मुताबिक नए सिरे से तय करने के निर्देश दिए हैं।
🔗 शादी और फरमान के खिलाफ दर्ज अपहरण के मामले से भी जुड़ा है जन्मतिथि का यह पूरा कानूनी पेंच
जन्मतिथि का यह विवाद मोनालिसा की फरमान के साथ हुई शादी के मामले में बेहद संवेदनशील और निर्णायक बन गया है। यदि 30 दिसंबर 2009 की जन्मतिथि को सही माना जाता है, तो विवाह के समय उनकी उम्र नाबालिग होने का सवाल खड़ा होता है, जबकि 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि के आधार पर वह बालिग साबित होती हैं। इसी उम्र के विवाद को लेकर मोनालिसा के पिता की शिकायत पर फरमान के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) के तहत अपहरण का मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में मोनालिसा की ओर से अधिवक्ता जेरी लोपेज ने अपना कानूनी पक्ष रखा। अब हाईकोर्ट के इस नए आदेश के बाद जन्म प्रमाण पत्र की वैधानिक स्थिति और अपहरण के मुकदमे से जुड़े कानूनी पहलुओं पर आगे की कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
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