नई दिल्ली: देश में बाल विवाह जैसी गंभीर सामाजिक कुप्रथा के मामलों में भले ही पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगातार कमी दर्ज की गई हो, लेकिन यह समस्या आज भी समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाल ही में सामने आए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 20 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 20.1 प्रतिशत महिलाओं का विवाह उनकी कानूनी उम्र यानी 18 वर्ष से पहले ही कर दिया गया था। इसका सीधा मतलब यह है कि आज भी हर पांचवीं महिला का विवाह तय कानूनी उम्र से पहले हो रहा है। हालांकि, इससे पहले आए एनएफएचएस-5 (2019-21) के आंकड़ों में यह प्रतिशत 23.3 फीसदी था, जिसके हिसाब से पिछले तीन सालों में इसमें 3.2 प्रतिशत की गिरावट जरूर आई है, फिर भी ज़मीनी स्तर पर स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। विभिन्न राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिलता है। पश्चिम बंगाल में लगभग 36.4 प्रतिशत और बिहार में 34.6 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही कर दी गई है। इसके विपरीत, साक्षरता के मामले में अग्रणी राज्य केरल में यह आंकड़ा महज 2.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि देश के कुछ चुनिंदा राज्यों में बाल विवाह की यह कुप्रथा राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी अधिक गंभीर और गहरी जड़ों वाली है। बाल विवाह के प्रचलन के पीछे गरीबी, शिक्षा का अभाव, परिवारों में लैंगिक भेदभाव और पुरानी रूढ़िवादी सामाजिक परंपराएं सबसे बड़ी वजहें मानी जाती हैं। आज भी कई परिवारों में बेटियों की उच्च शिक्षा और उनके उज्ज्वल करियर के मुकाबले उनकी शादी को प्राथमिकता दी जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर और तंगहाली में जीवन गुजारने वाले परिवारों में कम उम्र में ही बेटी की शादी कर देना अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी से जल्दी छुटकारा पाने का एक शॉर्टकट जरिया मान लिया जाता है। इसके अलावा, समाज का दबाब और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता की चिंताएं भी कम उम्र में विवाह का एक बड़ा कारण बन जाती हैं। जो लड़कियां बीच में ही अपनी स्कूल की पढ़ाई छोड़ देती हैं, उनके बाल विवाह का शिकार होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जिससे उनके रोजगार और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के सारे रास्ते सीमित हो जाते हैं। कम उम्र में विवाह होने का सीधा और नकारात्मक असर लड़कियों की सेहत, शारीरिक विकास और उनके संपूर्ण भविष्य पर पड़ता है। बहुत कम उम्र में गर्भधारण करने की स्थिति में मां और नवजात शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर गंभीर जोखिम बढ़ जाते हैं। इसके साथ ही, शादी के बाद पढ़ाई छूटने के कारण लड़कियों के हमेशा के लिए दूसरों पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने की आशंका बनी रहती है, जिससे उनके जीवन में घरेलू हिंसा और लैंगिक असमानता का खतरा भी काफी बढ़ जाता है। इस प्रकार बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुप्रथा मात्र नहीं है, बल्कि यह महिला स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से सीधे तौर पर जुड़ी हुई एक बहुआयामी समस्या है। भारत में बाल विवाह जैसी गैरकानूनी प्रथा को रोकने के लिए ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006’ पूरी सख्ती के साथ लागू किया गया है। इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के को कानूनी रूप से बच्चा माना गया है। कानून के तहत स्पष्ट निर्देश हैं कि बाल विवाह कराने, उसमें शामिल होने या किसी भी प्रकार की मदद करने वाले व्यक्तियों को दो वर्ष तक की कठोर कैद और एक लाख रुपये तक के भारी जुर्माने की सजा हो सकती है। इसके अलावा, कुछ विशेष परिस्थितियों में पीड़ित पक्ष अदालत के माध्यम से इस तरह के विवाह को अमान्य या रद्द भी करवा सकता है। देश से इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए केंद्र सरकार ने गत 27 नवंबर 2024 को ‘बाल विवाह मुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत की थी, जिसका मुख्य उद्देश्य वर्ष 2030 तक पूरे देश को पूरी तरह से बाल विवाह मुक्त बनाना है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार, इस राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत अब तक कुल 6.85 लाख से अधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं और देश के लगभग 12.47 करोड़ लोगों तक सीधी पहुंच बनाई गई है। इसके अतिरिक्त, इस मुहिम से जुड़कर करीब 42.01 लाख से अधिक नागरिकों ने बाल विवाह के खिलाफ डटकर खड़े होने का संकल्प लिया है। सरकार जागरूकता फैलाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों और ग्राम पंचायतों की भूमिका को भी लगातार मजबूत कर रही है। हालांकि, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि केवल कानूनों और अभियानों के भरोसे इस समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। वर्ष 2030 के इस महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने के लिए समाज को बेटियों की शिक्षा निरंतर जारी रखने, परिवारों की संकीर्ण मानसिकता बदलने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में और अधिक ठोस प्रयास करने होंगे।राज्यों के बीच बाल विवाह के मामलों में है भारी अंतर, पश्चिम बंगाल और बिहार में स्थिति सबसे गंभीर तो केरल में बेहद कम आंकड़े
कम उम्र में शादियां होने के पीछे गरीबी, अशिक्षा, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक परंपराएं जैसी कई मुख्य वजहें जिम्मेदार
नाबालिग अवस्था में शादी होने से लड़कियों के स्वास्थ्य और भविष्य पर पड़ता है बेहद बुरा असर, कई गंभीर जोखिमों का करना पड़ता है सामना
बाल विवाह को रोकने के लिए देश में कड़ा कानून है लागू, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत कड़े दंड और जुर्माने का है प्रावधान
वर्ष 2030 तक भारत को बाल विवाह मुक्त बनाने का है कड़ा लक्ष्य, सरकार द्वारा चलाए जा रहे व्यापक अभियानों से आ रहा है सकारात्मक बदलाव
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नई दिल्ली: देश में बाल विवाह जैसी गंभीर सामाजिक कुप्रथा के मामलों में भले ही पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगातार कमी दर्ज की गई हो, लेकिन यह समस्या आज भी समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाल ही में सामने आए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 20 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 20.1 प्रतिशत महिलाओं का विवाह उनकी कानूनी उम्र यानी 18 वर्ष से पहले ही कर दिया गया था। इसका सीधा मतलब यह है कि आज भी हर पांचवीं महिला का विवाह तय कानूनी उम्र से पहले हो रहा है। हालांकि, इससे पहले आए एनएफएचएस-5 (2019-21) के आंकड़ों में यह प्रतिशत 23.3 फीसदी था, जिसके हिसाब से पिछले तीन सालों में इसमें 3.2 प्रतिशत की गिरावट जरूर आई है, फिर भी ज़मीनी स्तर पर स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
राज्यों के बीच बाल विवाह के मामलों में है भारी अंतर, पश्चिम बंगाल और बिहार में स्थिति सबसे गंभीर तो केरल में बेहद कम आंकड़े
विभिन्न राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिलता है। पश्चिम बंगाल में लगभग 36.4 प्रतिशत और बिहार में 34.6 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही कर दी गई है। इसके विपरीत, साक्षरता के मामले में अग्रणी राज्य केरल में यह आंकड़ा महज 2.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि देश के कुछ चुनिंदा राज्यों में बाल विवाह की यह कुप्रथा राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी अधिक गंभीर और गहरी जड़ों वाली है।
कम उम्र में शादियां होने के पीछे गरीबी, अशिक्षा, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक परंपराएं जैसी कई मुख्य वजहें जिम्मेदार
बाल विवाह के प्रचलन के पीछे गरीबी, शिक्षा का अभाव, परिवारों में लैंगिक भेदभाव और पुरानी रूढ़िवादी सामाजिक परंपराएं सबसे बड़ी वजहें मानी जाती हैं। आज भी कई परिवारों में बेटियों की उच्च शिक्षा और उनके उज्ज्वल करियर के मुकाबले उनकी शादी को प्राथमिकता दी जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर और तंगहाली में जीवन गुजारने वाले परिवारों में कम उम्र में ही बेटी की शादी कर देना अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी से जल्दी छुटकारा पाने का एक शॉर्टकट जरिया मान लिया जाता है। इसके अलावा, समाज का दबाब और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता की चिंताएं भी कम उम्र में विवाह का एक बड़ा कारण बन जाती हैं। जो लड़कियां बीच में ही अपनी स्कूल की पढ़ाई छोड़ देती हैं, उनके बाल विवाह का शिकार होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जिससे उनके रोजगार और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के सारे रास्ते सीमित हो जाते हैं।
नाबालिग अवस्था में शादी होने से लड़कियों के स्वास्थ्य और भविष्य पर पड़ता है बेहद बुरा असर, कई गंभीर जोखिमों का करना पड़ता है सामना
कम उम्र में विवाह होने का सीधा और नकारात्मक असर लड़कियों की सेहत, शारीरिक विकास और उनके संपूर्ण भविष्य पर पड़ता है। बहुत कम उम्र में गर्भधारण करने की स्थिति में मां और नवजात शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर गंभीर जोखिम बढ़ जाते हैं। इसके साथ ही, शादी के बाद पढ़ाई छूटने के कारण लड़कियों के हमेशा के लिए दूसरों पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने की आशंका बनी रहती है, जिससे उनके जीवन में घरेलू हिंसा और लैंगिक असमानता का खतरा भी काफी बढ़ जाता है। इस प्रकार बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुप्रथा मात्र नहीं है, बल्कि यह महिला स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से सीधे तौर पर जुड़ी हुई एक बहुआयामी समस्या है।
बाल विवाह को रोकने के लिए देश में कड़ा कानून है लागू, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत कड़े दंड और जुर्माने का है प्रावधान
भारत में बाल विवाह जैसी गैरकानूनी प्रथा को रोकने के लिए ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006’ पूरी सख्ती के साथ लागू किया गया है। इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के को कानूनी रूप से बच्चा माना गया है। कानून के तहत स्पष्ट निर्देश हैं कि बाल विवाह कराने, उसमें शामिल होने या किसी भी प्रकार की मदद करने वाले व्यक्तियों को दो वर्ष तक की कठोर कैद और एक लाख रुपये तक के भारी जुर्माने की सजा हो सकती है। इसके अलावा, कुछ विशेष परिस्थितियों में पीड़ित पक्ष अदालत के माध्यम से इस तरह के विवाह को अमान्य या रद्द भी करवा सकता है।
वर्ष 2030 तक भारत को बाल विवाह मुक्त बनाने का है कड़ा लक्ष्य, सरकार द्वारा चलाए जा रहे व्यापक अभियानों से आ रहा है सकारात्मक बदलाव
देश से इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए केंद्र सरकार ने गत 27 नवंबर 2024 को ‘बाल विवाह मुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत की थी, जिसका मुख्य उद्देश्य वर्ष 2030 तक पूरे देश को पूरी तरह से बाल विवाह मुक्त बनाना है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार, इस राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत अब तक कुल 6.85 लाख से अधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं और देश के लगभग 12.47 करोड़ लोगों तक सीधी पहुंच बनाई गई है। इसके अतिरिक्त, इस मुहिम से जुड़कर करीब 42.01 लाख से अधिक नागरिकों ने बाल विवाह के खिलाफ डटकर खड़े होने का संकल्प लिया है। सरकार जागरूकता फैलाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों और ग्राम पंचायतों की भूमिका को भी लगातार मजबूत कर रही है। हालांकि, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि केवल कानूनों और अभियानों के भरोसे इस समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। वर्ष 2030 के इस महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने के लिए समाज को बेटियों की शिक्षा निरंतर जारी रखने, परिवारों की संकीर्ण मानसिकता बदलने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में और अधिक ठोस प्रयास करने होंगे।


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