जींद: भारत की सबसे महत्वाकांक्षी और देश की पहली पर्यावरण अनुकूल हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना (Hydrogen Train Project) से जुड़े जींद स्थित मुख्य प्लांट में फिलहाल गैस का उत्पादन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रहा है। पानी से आवश्यक मात्रा में हाइड्रोजन गैस नहीं निकलने के कारण ट्रेन का संचालन और शुरुआती परीक्षण (ट्रायल) बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इस गंभीर तकनीकी संकट की वजह से भारतीय रेलवे को ट्रायल व आवश्यक संचालन को जारी रखने के लिए अब पुणे और चेन्नई से विशेष टैंकरों के माध्यम से भारी खर्च पर हाइड्रोजन गैस मंगवानी पड़ रही है। इस बाहरी निर्भरता के कारण परियोजना की पूरी संचालन व्यवस्था लड़खड़ा गई है, जिससे रेलवे द्वारा तय की गई आधिकारिक समयसीमा (डेडलाइन) लगातार पिछड़ रही है।
🧪 पानी से गैस अलग करने की ‘इलेक्ट्रोलिसिस’ प्रक्रिया में आई तकनीकी दिक्कत: अपनी तय क्षमता से बेहद निचले स्तर पर है प्लांट
परियोजना के तकनीकी पहलुओं पर नजर डालें तो हाइड्रोजन ट्रेन के शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) संचालन के लिए जींद में एक विशेष अत्याधुनिक रिफ्यूलिंग और प्रोडक्शन प्लांट स्थापित किया गया है। इस हब में पानी ($H_2O$) से ‘इलेक्ट्रोलिसिस’ (Electrolysis Process) प्रक्रिया के जरिए ग्रीन हाइड्रोजन गैस तैयार की जानी थी। लेकिन धरातल पर प्लांट में गैस उत्पादन की क्षमता इंजीनियरिंग उम्मीदों के अनुरूप गति नहीं पकड़ पाई है। कुछ गंभीर तकनीकी दिक्कतों और फिल्टरेशन एरर के कारण पानी से उतनी मात्रा में शुद्ध हाइड्रोजन गैस अलग नहीं हो पा रही है, जितनी ट्रेन के सुचारू संचालन, दबाव परीक्षण और नियमित गति परीक्षण के लिए आवश्यक है। वर्तमान में यह करोड़ों की लागत से बना प्लांट अपनी तय उत्पादन क्षमता के बेहद निचले और चिंताजनक स्तर पर काम कर रहा है।
🚄 ‘मेक इन इंडिया’ की ताकत है 2600 यात्रियों की क्षमता वाली यह स्वदेशी ट्रेन: देश में आगे 35 और ट्रेनें चलाने की है योजना
इस तकनीकी बाधा के इतर, देश की पहली और विश्व की सबसे बड़ी हाइड्रोजन ट्रेनों में शुमार इस ट्रेन की खासियत यह है कि इसे पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक (Indigenous Technology) से भारत में ही निर्मित किया गया है। चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में इसे विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसमें इस्तेमाल की गई प्रोपल्शन और फ्यूल-सेल तकनीक भारतीय इंजीनियरों की कड़ी मेहनत का गौरवशाली नतीजा है, जो ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) और आत्मनिर्भर भारत का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।
इस अत्याधुनिक हाइड्रोजन ट्रेन में एक साथ 2,600 से ज्यादा यात्री बेहद सुरक्षित और आरामदायक सफर तय कर सकते हैं। इतनी विशाल यात्री क्षमता इसे वैश्विक स्तर पर खास बनाती है। इससे रूट पर आम यात्रियों को भीड़भाड़ से बड़ी राहत मिलेगी। यदि जींद प्लांट की तकनीकी खराबी जल्द दुरुस्त हो जाती है, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा विकसित देशों की एलीट लिस्ट में शामिल हो जाएगा जहां हाइड्रोजन ट्रेनें सफलता से पटरी पर दौड़ रही हैं। इस शुरुआती ट्रेन के सफल कमर्शियल रन के बाद रेल मंत्रालय की योजना देश के विभिन्न हेरिटेज और पर्यावरण-संवेदनशील रूटों पर आगे 35 और नई हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की है।
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