संसद के पटल पर जब कोई जनप्रतिनिधि (सांसद) सवाल खड़ा करता है, तो वह केवल कागजी प्रश्न नहीं होता। उसके पीछे किसी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र की टूटी सड़क, प्राकृतिक आपदा से तबाह किसान की फसल, अस्पताल में बेड के लिए जूझते मरीज का इलाज, रोजगार की तलाश में भटकते युवा की उम्मीद या फिर मध्यमवर्गीय परिवार पर महंगाई का बोझ जैसी बुनियादी समस्याएं होती हैं।
संसद का प्रश्नकाल (Question Hour) कार्यपालिका और सरकार की जवाबदेही तय करने का सबसे सशक्त और लोकतांत्रिक माध्यम है।
लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल यही है कि विधायी प्रक्रियाओं में पूछे जाने वाले लाखों सवालों के बीच आम नागरिकों के जीवन से सीधे जुड़े जमीनी मुद्दों को वास्तविक रूप में कितनी प्राथमिकता और स्थान मिल पाता है। विभिन्न संसदीय अध्ययनों और आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण इस संदर्भ में कई चौंकाने वाले और विचारणीय पहलू सामने रखता है।
📊 स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और कृषि: संसद के पटल पर पहुंचे आम नागरिकों के रोजमर्रा के विषय
विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत सांसदों द्वारा उठाए गए प्राथमिक मुद्दों का ब्योरा:
स्वास्थ्य क्षेत्र: स्वास्थ्य संबंधी प्रश्नों में मुख्य रूप से कैंसर के इलाज की लागत, डेंगू-मलेरिया की रोकथाम, नए एम्स (AIIMS) संस्थानों की स्थापना और प्राथमिक व ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर चर्चा हुई।
शिक्षा व्यवस्था: स्कूलों के बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की कमी, केंद्रीय विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के स्तर से जुड़े प्रश्न उठाए गए।
रोजगार और श्रम: ईपीएफओ (EPFO) व प्रोविडेंट फंड के नियम, संगठित-असंगठित क्षेत्र में रोजगार और मनरेगा (ग्रामीण रोजगार) पर सरकार से जवाब मांगा गया।
कृषि और ग्रामीण विकास: बेमौसम बारिश व सूखे से फसलों के नुकसान, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और किसानों की आय से संबंधित प्रश्न शामिल रहे।
बुनियादी सुविधाएं: इसके अलावा राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे कनेक्टिविटी, शुद्ध पेयजल, नमामि गंगे परियोजना, महिला सुरक्षा और बाल संरक्षण से जुड़े विषय भी संसद के दोनों सदनों में गूंजे।
राज्यसभा के एक विशेष सत्र के दौरान प्राप्त प्रश्नों का सांख्यिकीय विवरण:📑 एक सत्र का रिपोर्ट कार्ड: राज्यसभा के 235वें सत्र में मिले 5,716 सवालों के नोटिस
प्रश्नों का वर्गीकरण: 23 अप्रैल से 13 मई 2015 तक चले राज्यसभा के 235वें सत्र में सांसदों की ओर से कुल 5,716 प्रश्नों के नोटिस दिए गए। इनमें से 3,771 तारांकित (मौखिक उत्तर हेतु) और 1,945 अतारांकित (लिखित उत्तर हेतु) प्रश्न थे।
स्वीकृत प्रश्न: सदन में नियमों की जांच के बाद कुल 2,219 प्रश्नों को विधिवत स्वीकार किया गया।
प्रमुख मंत्रालयों की हिस्सेदारी: सबसे ज्यादा प्रश्न गृह मंत्रालय (427 नोटिस), वित्त मंत्रालय (424 नोटिस) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (404 नोटिस) से संबंधित रहे।
अन्य विभाग: मानव संसाधन विकास/शिक्षा मंत्रालय को 249, कृषि मंत्रालय को 232, रेल मंत्रालय को 219 और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को 218 सवालों के नोटिस प्राप्त हुए।
1999 से 2023 तक गरीबी से संबंधित प्रश्नों का विस्तृत अध्ययन:📉 गरीबी उन्मूलन पर 24 वर्षों में महज 2% सवाल: लोकसभा डेटा में दिखा बदलता नजरिया
सवालों की कुल संख्या: 1999 से फरवरी 2023 के बीच लोकसभा में पूछे गए कुल 3,45,566 सवालों में से गरीबी से जुड़े प्रश्नों की संख्या मात्र करीब 7,000 रही, जो कुल सवालों का लगभग 2 प्रतिशत बैठती है।
कार्यकालों के अनुसार आंकड़े: 2004 से 2009 के दौरान 66,371 प्रश्न; 2009 से 2014 में 79,401 प्रश्न; 2014 से 2019 में 78,990 प्रश्न और 2019 से फरवरी 2023 तक 47,273 प्रश्न पूछे गए।
नीतिगत बदलाव: अध्ययन के अनुसार समय के साथ गरीबी पर सवालों की दिशा भी बदली। 2004 से 2014 के दौर में अधिकार आधारित नीतियों (Rights-based Policies) और व्यापक आर्थिक विकास पर जोर रहा, जबकि 2014 के बाद बुनियादी कल्याणकारी योजनाओं और प्रत्यक्ष सरकारी सेवाओं की डिलीवरी पर ध्यान केंद्रित दिखा।
दिसंबर 2015 से दिसंबर 2025 के बीच पर्यावरण पर संसदीय ट्रेंड:🌡️ जलवायु परिवर्तन पर 10 साल में 8,702 सवाल: आपदाओं के बाद दिखी सांसदों की सक्रियता
कुल हिस्सेदारी: एक दशक में संसद में पूछे गए 23 लाख से अधिक सवालों में से जलवायु और पर्यावरण से जुड़े प्रश्नों की संख्या 8,702 रही, जो कुल योग का महज 3 प्रतिशत के करीब है।
क्लीन एनर्जी पर सबसे ज्यादा फोकस: जलवायु से संबंधित कुल सवालों में से 2,938 प्रश्न (33.81 प्रतिशत) स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने से जुड़े थे।
नीतिगत विषयों की उपेक्षा: वैश्विक जलवायु शासन (Global Climate Governance) पर केवल 1.2 प्रतिशत और क्लाइमेट फाइनेंस पर मात्र 0.26 प्रतिशत प्रश्न ही पूछे गए।
प्राकृतिक त्रासदियों का असर: रिपोर्ट में रेखांकित किया गया कि 2021 की उत्तराखंड ग्लेशियर आपदा और 2022 में पड़ी भीषण हीटवेव (रिकॉर्ड गर्मी) जैसी बड़ी पर्यावरणीय घटनाओं के तुरंत बाद ही सांसदों ने संबंधित विषयों पर प्रश्नकाल में तत्परता दिखाई।
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