पलामू (झारखंड): झारखंड के पलामू जिले में गरीबी और रोजगार के अभाव के कारण मौसमी पलायन से लेकर नौकरी के लिए स्थायी पलायन का सिलसिला अनवरत जारी है। मानसून के आगमन के साथ ही देश भर में धान की रोपाई शुरू हो जाती है, जिसके लिए उत्तर प्रदेश और बिहार के कृषि क्षेत्र पलामू, गढ़वा और लातेहार जैसे जिलों के मजदूरों पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं।
पलामू से प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में मजदूर बिहार के औरंगाबाद, सासाराम और भभुआ से लेकर उत्तर प्रदेश के बलिया जिले तक जाते हैं। पलामू के कई गांव तो ऐसे हैं जहां से मानसून आते ही पूरा का पूरा परिवार पलायन कर जाता है। जून के दूसरे सप्ताह से शुरू होकर जुलाई के अंतिम सप्ताह तक चलने वाले इस मौसमी पलायन का कोई ठोस आधिकारिक आंकड़ा किसी प्रशासनिक अधिकारी के पास नहीं है।
💰 ₹350 दैनिक मजदूरी और 12 किलो अनाज के एवज में खेतों में पसीना बहाते हैं भूमिहीन ग्रामीण
बिहार और उत्तर प्रदेश के कृषि फार्मों में धान की रोपाई के लिए जाने वाले प्रत्येक मजदूर को प्रतिदिन ₹350 की नकद मजदूरी दी जाती है। इसके अलावा मजदूरी के एवज में 12 किलोग्राम धान या अन्य खाद्यान्न भी दिया जाता है।
पलायन करने वाले ज्यादातर परिवार बेहद गरीब और भूमिहीन हैं। इस मौसमी पलायन से मिलने वाला अनाज और नकदी कई परिवारों का साल भर का गुजर-बसर चलाती है, जबकि कुछ परिवार जरूरत पड़ने पर इस अनाज को बाजार में बेचकर अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
📊 केस स्टडी: बूढ़ीबिर के चोटहांसा गांव से 50 वर्षों से जारी है पलायन, पूरी दलित आबादी होती है रवाना
पलामू प्रमंडल मुख्यालय मेदिनीनगर से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित बूढ़ीबिर का चोटहांसा गांव मौसमी पलायन का एक बड़ा उदाहरण है। इस गांव से हर साल धान रोपाई के मौसम में 60 से 70 लोग पलायन करते हैं, जिनमें कम उम्र की नाबालिग लड़कियां भी शामिल होती हैं।
वर्ष 2026 में भी गांव से लगभग 60 महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग बिहार के सासाराम-भभुआ इलाके में धान रोपाई के लिए गए थे, जो अब अपना कार्य पूरा कर वापस लौट चुके हैं। गांव की पूरी दलित आबादी पिछले 50 वर्षों से भी अधिक समय से इस पलायन की परंपरा को ढोने पर मजबूर है। वहीं गांव के अधिकांश युवा काम की तलाश में दूसरे बड़े राज्यों का रुख कर चुके हैं।
⚠️ सड़क हादसों में जा रही हैं जानें, 28 नाबालिगों को रेस्क्यू कर बाल कल्याण समिति ने रोका पलायन
धान रोपाई और कटाई के लिए जाने वाले मजदूर अक्सर ओवरलोडेड वाहनों में सफर करने के कारण भयानक सड़क हादसों का शिकार हो जाते हैं। जुलाई 2025 में पलामू के छतरपुर थाना क्षेत्र में सासाराम जा रही मजदूरों से भारी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, जिसमें 4 मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई थी।
इससे पहले वर्ष 2011-12 में हुआ हादसा सबसे भयावह था, जब बिहार में धान कटाई के लिए जा रहे पलामू और लातेहार के 25 मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई थी। हाल ही में पलामू बाल कल्याण समिति ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बिहार की ओर ले जाए जा रहे 28 नाबालिग बच्चों को रेस्क्यू कर बाल श्रम और पलायन से बचाया था।
🏛️ औद्योगिक विकास से ही रुकेगा पलायन, विधानसभा में फिर उठाऊंगा मुद्दा: डालटनगंज विधायक आलोक चौरसिया
पलामू से पलायन का यह संवेदनशील मुद्दा राज्य विधानसभा से लेकर देश की संसद तक कई बार गूंज चुका है। पलामू के चैनपुर, रामगढ़, सतबरवा, लेस्लीगंज और पांकी इलाकों से सबसे ज्यादा पलायन होता है।
मामले पर डालटनगंज के विधायक आलोक चौरसिया ने कहा, “विधानसभा में कई बार पलायन के इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया है। हम लगातार राज्य सरकार से मांग कर रहे हैं कि पलामू में भारी उद्योग और रोजगार परक प्रतिष्ठान स्थापित किए जाएं। पलामू में केवल धान रोपाई ही नहीं, बल्कि कई रूपों में पलायन हो रहा है। आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को फिर से पुरजोर तरीके से उठाने की पूरी तैयारी है।”
स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार की कमी, भूमिहीनता और सम्मानजनक आय की तलाश का यह दर्द दशकों से पलामू की नियति बना हुआ है, जिसका स्थायी समाधान केवल औद्योगिक विकास से ही संभव है।
यह खबर आपको कैसी लगी?


झारखण्ड




























