नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने 49 करोड़ रुपये के एक बहुत बड़े और बहुराज्यीय ठगी (Investment Chit Fund Scam) के मामले में मुख्य आरोपियों की ओर से दायर विशेष ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। आरोपियों द्वारा दायर इस याचिका में देश के विभिन्न राज्यों में दर्ज की गई अलग-अलग प्राथमिकियों (FIR) को एक साथ जोड़कर (Club) एक ही जगह सुनवाई करने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कानून और पारदर्शिता के हित में यह बड़ा और नजीर बनने वाला निर्देश दिया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह सख्त फैसला मामले के मुख्य आरोपी उपेंद्र नाथ मिश्रा और काली प्रसाद मिश्रा की ओर से दायर ट्रांसफर याचिका पर कानूनी सुनवाई के बाद दिया है। इन दोनों शातिर आरोपियों के खिलाफ देश के भोले-भाले निवेशकों से कथित तौर पर 49 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि ठगने के कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने साफ-साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि हमारी लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली को किसी भी वित्तीय अपराध के आरोपितों की व्यक्तिगत सुविधा के बजाय, अपनी गाढ़ी कमाई खो चुके पीड़ित निवेशकों के कानूनी अधिकारों को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आरोपियों की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी की तकनीकी दलीलों और तर्कों से रत्ती भर भी सहमति नहीं जताई। अदालत की पीठ का रुख इस आर्थिक अपराध को लेकर बेहद कड़ा और सख्त था। अदालत की इस तीखी और गंभीर टिप्पणियों को भांपते हुए आरोपियों के वकील ने अंततः अपनी ट्रांसफर याचिका को बिना शर्त वापस (Withdraw) लेने में ही अपनी भलाई समझी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन ठगों के खिलाफ देश के सात बड़े राज्यों—ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश में गंभीर धोखाधड़ी के कई आपराधिक मामले पहले से ही लंबित हैं। मामले की लाइव सुनवाई के दौरान देश के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने आरोपियों के वकील से बेहद गंभीर और तार्किक सवाल पूछा कि, “अगर कानूनन इन सभी राज्यों की एफआईआर को आरोपितों की मांग पर एक जगह ट्रांसफर कर दिया जाए, तो इस सूरत में देश के अलग-अलग कोनों में बैठे और धोखाधड़ी के शिकार हुए गरीब लोगों के अधिकारों का क्या होगा? क्या यह सामाजिक और कानूनी रूप से ठीक होगा कि सैकड़ों बुजुर्ग और बेबस पीड़ितों को सिर्फ अपराध के आरोपी की व्यक्तिगत सुविधा के लिए विभिन्न राज्यों से चलकर किसी एक दूरदराज स्थान पर आने के लिए मजबूर किया जाए?” कोर्ट की इस मानवीय टिप्पणी की कानूनी गलियारों में काफी सराहना की जा रही है।⚖️ आरोपी उपेंद्र नाथ और काली प्रसाद मिश्रा की ट्रांसफर याचिका खारिज: कोर्ट ने कहा—न्याय प्रणाली में पीड़ितों के अधिकार सबसे पहले
💼 वरिष्ठ वकील अमन लेखी की दलीलों से असहमत हुई सुप्रीम कोर्ट की पीठ: कड़े रुख को देखते हुए बैकफुट पर आए आरोपी
💬 “आरोपी की सुविधा के लिए पीड़ित दर-दर क्यों भटके?”: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दागे तीखे और संवेदनशील सवाल
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नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने 49 करोड़ रुपये के एक बहुत बड़े और बहुराज्यीय ठगी (Investment Chit Fund Scam) के मामले में मुख्य आरोपियों की ओर से दायर विशेष ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई करने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। आरोपियों द्वारा दायर इस याचिका में देश के विभिन्न राज्यों में दर्ज की गई अलग-अलग प्राथमिकियों (FIR) को एक साथ जोड़कर (Club) एक ही जगह सुनवाई करने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कानून और पारदर्शिता के हित में यह बड़ा और नजीर बनने वाला निर्देश दिया है।
⚖️ आरोपी उपेंद्र नाथ और काली प्रसाद मिश्रा की ट्रांसफर याचिका खारिज: कोर्ट ने कहा—न्याय प्रणाली में पीड़ितों के अधिकार सबसे पहले
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह सख्त फैसला मामले के मुख्य आरोपी उपेंद्र नाथ मिश्रा और काली प्रसाद मिश्रा की ओर से दायर ट्रांसफर याचिका पर कानूनी सुनवाई के बाद दिया है। इन दोनों शातिर आरोपियों के खिलाफ देश के भोले-भाले निवेशकों से कथित तौर पर 49 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि ठगने के कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने साफ-साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि हमारी लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली को किसी भी वित्तीय अपराध के आरोपितों की व्यक्तिगत सुविधा के बजाय, अपनी गाढ़ी कमाई खो चुके पीड़ित निवेशकों के कानूनी अधिकारों को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए।
💼 वरिष्ठ वकील अमन लेखी की दलीलों से असहमत हुई सुप्रीम कोर्ट की पीठ: कड़े रुख को देखते हुए बैकफुट पर आए आरोपी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आरोपियों की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी की तकनीकी दलीलों और तर्कों से रत्ती भर भी सहमति नहीं जताई। अदालत की पीठ का रुख इस आर्थिक अपराध को लेकर बेहद कड़ा और सख्त था। अदालत की इस तीखी और गंभीर टिप्पणियों को भांपते हुए आरोपियों के वकील ने अंततः अपनी ट्रांसफर याचिका को बिना शर्त वापस (Withdraw) लेने में ही अपनी भलाई समझी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन ठगों के खिलाफ देश के सात बड़े राज्यों—ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश में गंभीर धोखाधड़ी के कई आपराधिक मामले पहले से ही लंबित हैं।
💬 “आरोपी की सुविधा के लिए पीड़ित दर-दर क्यों भटके?”: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दागे तीखे और संवेदनशील सवाल
मामले की लाइव सुनवाई के दौरान देश के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने आरोपियों के वकील से बेहद गंभीर और तार्किक सवाल पूछा कि, “अगर कानूनन इन सभी राज्यों की एफआईआर को आरोपितों की मांग पर एक जगह ट्रांसफर कर दिया जाए, तो इस सूरत में देश के अलग-अलग कोनों में बैठे और धोखाधड़ी के शिकार हुए गरीब लोगों के अधिकारों का क्या होगा? क्या यह सामाजिक और कानूनी रूप से ठीक होगा कि सैकड़ों बुजुर्ग और बेबस पीड़ितों को सिर्फ अपराध के आरोपी की व्यक्तिगत सुविधा के लिए विभिन्न राज्यों से चलकर किसी एक दूरदराज स्थान पर आने के लिए मजबूर किया जाए?” कोर्ट की इस मानवीय टिप्पणी की कानूनी गलियारों में काफी सराहना की जा रही है।


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