चंडीगढ़: बेटियां जहां मां का प्रतिबिंब होती हैं, वहीं परिवार की शान भी होती हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण की बेटी आयशना कल्याण द्वारा की गई एक भावुक और विचारशील पोस्ट से पारिवारिक संस्कारों के सुंदर निर्वाह का प्रतिबिंब झलकता है। आयशना ने अपनी पोस्ट के जरिए आधुनिक दौर में भी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को जीवित रखने का एक बेहद खूबसूरत संदेश दिया है, जिसे नेटिजन्स द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है।
🏡 नाना-नानी के घर की यादें: विदाई के समय ‘तिलक’ करने की वो मार्मिक और स्नेहपूर्ण प्रथा
आयशना कल्याण ने अपनी पोस्ट में लिखा, “बचपन में नाना-नानी के घर में बिताई गर्मियों और सर्दियों की छुट्टियों का एक आम नज़ारा होता था—घर आए अतिथि या रिश्तेदार को विदा करते समय उनका ‘तिलक’ करने की प्रथा। मुझ जैसे छोटे बच्चे के लिए यह प्रक्रिया जितनी आश्चर्यजनक थी, उतनी ही मार्मिक भी थी। उस पूरी प्रक्रिया में विदाई की अफ़रा-तफ़री में एक ठहराव आ जाता था। बड़े अपनी गति को धीमा कर एक-दूसरे को क्षण-भर ही सही मगर आँख-भर देखते, आशीर्वाद लेते थे। और मेरा सबसे पसंदीदा अंश था—बड़ों से कुछ शगन के पैसे या घर के बने स्वादिष्ट पकवानों से भरे पैकेट का मिलना।”
📜 क्या है ‘तिलक’ का असली महत्व?: आज्ञा चक्र से जुड़ा है इसका विज्ञान और अंगुलियों के अनुसार इसके नियम
आयशना कल्याण ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा, “खैर, आज का विषय है ‘तिलक’.. जैसे-जैसे हम बड़े हुए, पूछताछ करने पर बड़ों ने हमें समझाया कि हमारी संस्कृति में ‘तिलक’ शुभता व सम्मान का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। माथे के बीच तिलक लगाने की जगह को ‘आज्ञा चक्र’ कहते हैं, जो कि सीधे हमारे ध्यान और सकारात्मक सोच से जुड़ा है। तिलक लगाने के कई प्रकार और नियम शास्त्रों में बताए गए हैं—अंगूठे से तिलक (सम्मान/विजय के लिए), तर्जनी से पितरों को, मध्यमा से स्वयं को तथा अनामिका से देवताओं को तिलक लगाया जाता है।”
🪷 मां ने ससुराल में भी कायम रखी परंपरा: महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा तक, पीढ़ी दर पीढ़ी समृद्ध हो रही विरासत
आयशना कल्याण ने अपनी मां के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए लिखा, “मेरी माँ ने यह सुंदर प्रथा अपने हरियाणवी ससुराल में आज तक पूरी निष्ठा के साथ कायम रखी है। उनकी गैर-मौजूदगी में भी वे हमें फोन पर निर्देश ज़रूर देती हैं कि किस विधि से कैसा तिलक करना है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में पुरुषों को केवल कुमकुम तथा स्त्रियों को कुमकुम के साथ-साथ हल्दी का भी तिलक लगाते हैं। कुमकुम को लक्ष्मी जी का प्रतीक माना जाता है और हल्दी को विष्णु जी का। ऐसी छोटी-छोटी रीतियां और पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ाते रहना ही तो है… ऐसे ही तो हमारी विरासत अस्तित्वमयी तथा संपन्न रहती है।”
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