इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए बाध्य करने हेतु बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर नहीं कर सकते। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को केवल इस आधार पर किसी अन्य के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि वे उसके माता-पिता हैं, यदि वह अपनी स्वतंत्र इच्छा से कहीं और रहना चाहती है।
👩🦰 कलावती देवी ने दायर की थी हेबियस कॉर्पस याचिका: 25 वर्षीय बेटी पूजा ने कोर्ट में कहा- वह अपनी मर्जी से दिल्ली में रह रही है
यह पूरा मामला कलावती देवी द्वारा अपनी 25 साल की बेटी कुमारी पूजा को कोर्ट के सामने पेश करने की गुहार लगाते हुए हेबियस कॉर्पस याचिका के रूप में दायर किया गया था। पूर्व के आदेश के पालन में जब युवती को हाईकोर्ट में पेश किया गया, तो उसने अदालत के समक्ष खुलकर अपनी बात रखी। पूजा ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी अवैध हिरासत में नहीं है, बल्कि अपनी मर्जी से दिल्ली में स्वतंत्र जीवन जी रही है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसकी मां का व्यवहार उसके प्रति सही नहीं रहा है और उसे मायके में दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है, जिसके चलते वह अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती।
📜 कोर्ट ने बेटी के बयानों को माना सर्वोपरि: बालिग और सक्षम होने के कारण अपनी पसंद से रहने की मिली पूरी स्वतंत्रता
बेटी के बयानों और उसकी स्वतंत्र इच्छा का गहराई से विश्लेषण करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुँची कि 25 वर्षीय युवती पूरी तरह बालिग, समझदार और सक्षम है। वह अपने भले-बुरे को भली-भांति समझती है और उसने होश-ओ-हवास में अपनी मर्जी से मां के साथ न रहने का विकल्प चुना है। अदालत ने याची मां के सभी आरोपों और दावों को खारिज करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को अधिकार क्षेत्र से बाहर और आधारहीन मानते हुए निरस्त कर दिया।
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