बड़वानी: मध्य प्रदेश के बड़वानी शहर के रानीपुरा मोहल्ले में स्थित ऐतिहासिक श्री सांवलियाजी धाम धार्मिक आस्था, समर्पण, सेवा और आपसी सामाजिक समरसता का एक जीवंत प्रतीक है। दीपावली के ठीक बाद आने वाले पावन कार्तिक माह के दौरान यहां हर साल भगवान श्री सांवलिया सेठ की विशेष अन्नकूट महाप्रसादी और पारंपरिक पंगत का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें शिरकत करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
लगभग 100 वर्षों पुरानी रियासतकालीन परंपरा, राजस्थान के मंडफिया धाम की तर्ज पर बड़वानी में सजी पंगत
इस धार्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस प्रकार राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया स्थित विश्वविख्यात श्री सांवरिया सेठ धाम में भव्य पंगत का आयोजन किया जाता है, ठीक उसी शैली और श्रद्धा भाव के साथ बड़वानी के रानीपुरा में भी यह आयोजन संपन्न होता है। लगभग एक शताब्दी यानी करीब 100 वर्षों से अधिक समय से रियासतकाल से चली आ रही इस पारंपरिक व्यवस्था में निमाड़, मालवा और प्रदेश के अन्य हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर महाप्रसादी ग्रहण करते हैं।
करीब 154 वर्ष पुराना है रानीपुरा का सांवलियाजी मंदिर, विभिन्न समाजों द्वारा अलग-अलग दिनों में होता है आयोजन
रानीपुरा में सुशोभित यह सांवलियाजी का मंदिर लगभग 154 साल पुराना माना जाता है, जहां भगवान श्री सांवलिया सेठ की श्याम वर्ण की अत्यंत मनोहारी और आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। यहां पीढ़ियों से स्थानीय परिवारों द्वारा नियमित पूजन और सेवा-सुश्रुषा की जाती रही है। राजस्थान के मंडफिया धाम की तर्ज पर यहां सर्व ब्राह्मण समाज, दशोरा महाजन समाज और बीसा नीमा महाजन समाज द्वारा अलग-अलग निर्धारित तिथियों में पूरे उत्साह व श्रद्धा के साथ महाप्रसादी के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
खरगोन के कानूनगो परिवार ने संभाली वर्ष 2026 की पहली महाप्रसादी की मेजबानी, नवयुवक मंडल का रहा विशेष सहयोग
बड़वानी की श्री गौड़ मालवीय ब्राह्मण धर्मशाला में वर्ष 2026 की पहली महाप्रसादी की पंगत का आयोजन 1 नवंबर की शाम 7 बजे किया गया। आराध्य श्री कुलदेवी और श्री सांवरिया सेठ की असीम अनुकंपा से इस धार्मिक अनुष्ठान की मेजबानी खरगोन निवासी प्रदीप कानूनगो व मीना कानूनगो के परिवार द्वारा हर्षोल्लास के साथ की गई। आयोजक परिवार की ओर से समाज के सभी प्रबुद्ध जनों, सगे-संबंधियों और इष्ट-मित्रों को सपरिवार उपस्थित रहकर महाप्रसादी का लाभ उठाने का आमंत्रण दिया गया था, जिसमें स्थानीय नवयुवक मंडल की भी सक्रिय सहभागिता देखने को मिली।
पारंपरिक व्यंजनों से सजी पंगत और एक साथ बैठकर भोजन करने की अनूठी परंपरा देती है सामाजिक एकता का संदेश
इस पारंपरिक महाप्रसादी की एक अन्य मुख्य पहचान इसमें परोसे जाने वाले विशेष व्यंजन हैं। इस दौरान गुड़ की मीठी थूली तथा चवला-भाजी के साथ मिश्रित सब्जियों की स्वादिष्ट प्रसादी श्रद्धालुओं को बड़े आत्मीय भाव से परोसी जाती है। एक ही कतार (पंगत) में जमीन पर बैठकर एक साथ भोजन ग्रहण करना धार्मिक निष्ठा के साथ-साथ आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता का सशक्त संदेश देता है।
महाप्रसादी की मेजबानी पाने के लिए वर्षों का इंतजार, भगवान सांवरिया सेठ के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक
इस अद्वितीय आयोजन के प्रति समाज के लोगों में इतना अधिक उत्साह रहता है कि कई परिवार अपनी बारी आने के लिए 7 से 8 वर्षों तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। यह लंबा इंतजार केवल किसी आयोजन की औपचारिकता नहीं है, बल्कि भगवान सांवरिया सेठ के चरणों में उनकी अगाध श्रद्धा और सेवा भाव को दर्शाता है। मेजबानी करने वाले परिवार शहर के कोने-कोने में जाकर लोगों को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करते हैं और स्नेहपूर्वक कहते हैं— ‘आओ, सांवलिया जी ने बुलाया है’।
नई पीढ़ी के सक्रिय सहयोग से निरंतर फल-फूल रही है डेढ़ सदी पुरानी सांस्कृतिक धरोहर
कार्तिक मास के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाला यह महाप्रसादी उत्सव हजारों लोगों को आपसी स्नेह के सूत्र में पिरोने का बड़ा माध्यम बनता है। यहां जाति, वर्ग और व्यक्तिगत दूरियों की सीमाओं से परे हटकर सभी लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। करीब डेढ़ सौ साल पुराने इस मंदिर से जुड़ी यह अनमोल परंपरा आज के दौर में भी युवा पीढ़ी के जोश और सहयोग से निरंतर आगे बढ़ रही है। बड़वानी की यह सांवलियाजी पंगत इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति केवल रीति-रिवाजों से नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास और सेवा भावना से जीवित रहती है।
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