बिलासपुर: डिजिटल क्रांति और ऑनलाइन बैंकिंग के इस दौर में साइबर अपराधी ठगी की रकम को सुरक्षित रूप से ठिकाने लगाने और कानून के लंबे हाथों से खुद को बचाने के लिए एक बेहद खतरनाक रास्ता अपना रहे हैं। ये शातिर अपराधी अब अंचल के युवा बेरोजगारों, कॉलेज के छात्रों और सीधे-साधे गरीब मजदूरों को अपना आसान मोहरा बना रहे हैं। इन जरूरतमंद लोगों की आर्थिक तंगी का गलत फायदा उठाकर साइबर ठग महज 5 से 10 हजार रुपये के लालच में उनके नाम पर खुले बैंक खाते, एटीएम (ATM) कार्ड और एक्टिवेटेड सिमकार्ड अपने कब्जे में ले लेते हैं। इसके बाद अपराधी खुद उन खातों का ऑनलाइन संचालन कर देश भर से होने वाली ठगी की काली कमाई को उसमें ट्रांसफर कर सुरक्षित कर लेते हैं। इस पूरे नेटवर्क का सनसनीखेज खुलासा बिलासपुर जिले के विभिन्न थानों में दर्ज 13 गंभीर मामलों की विस्तृत साइबर जांच में हुआ है, जिनमें स्थानीय मजदूरों और छात्रों सहित ऐसे 30 लोगों के सक्रिय बैंक खाते शामिल पाए गए हैं।
👥 आर्थिक तंगी और अज्ञानता का फायदा उठा रहे अपराधी: पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए ‘म्यूल अकाउंट’ का काला खेल
साइबर सेल और बिलासपुर पुलिस द्वारा इन संदिग्ध ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) के खिलाफ की गई संयुक्त जांच में यह कड़वी सच्चाई सामने आई है कि इस डिजिटल काले खेल की गिरफ्त में पूरी तरह से वही लोग आ रहे हैं जो या तो भयंकर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं या फिर डिजिटल साक्षरता की कमी (अज्ञानता) के शिकार हैं। पुलिस की आंखों में धूल झोंकने और जांच भटकाने के लिए अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय ठग स्थानीय कॉलेजों के छात्रों, सुदूर ग्रामीणों और नौकरी की तलाश कर रहे बेरोजगारों को अपना ‘मोहरा’ बना रहे हैं। जब पुलिस ठगी के पैसों का ट्रेल (Route) खंगालते हुए इन खातों तक पहुंचती है, तो मुख्य अपराधी के बजाय ये मासूम और जरूरतमंद लोग कानूनी पचड़े में फंस जाते हैं, जबकि असली मास्टरमाइंड पर्दे के पीछे से पूरा रैकेट चलाता रहता है। पुलिस अब इन 30 खाताधारकों से पूछताछ कर मुख्य सप्लायरों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
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