जबलपुर/नई दिल्ली: मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI Act 2005) के कानूनी दायरे से बाहर रखने के राज्य सरकार के फैसले पर देश की सर्वोच्च अदालत में अहम मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार महेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुलकर की युगलपीठ (बेंच) ने मप्र शासन द्वारा साल 2011 में जारी की गई विवादित अधिसूचना (Notification) की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपनी अंतिम सुनवाई पूरी कर ली है। देश की शीर्ष अदालत ने इस अत्यंत संवेदनशील और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़े मामले पर विस्तृत बहस सुनने के बाद अपना अंतिम आदेश सुरक्षित (Judgment Reserved) रख लिया है।
🏛️ “किस कानूनी आधार पर लोकायुक्त को दी गई छूट?”: सुप्रीम कोर्ट ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और राज्य सरकार से मांगा जवाब
इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश राज्य की ओर से राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) प्रशांत सिंह ने सरकार का मजबूत पक्ष और दलीलें अदालत के समक्ष रखीं। इस हाई-प्रोफाइल मामले में पूर्व की सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मप्र सरकार से बेहद तल्ख लहजे में पूछा था कि आखिर किस कानूनी आधार और संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करके लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार कानून के प्रावधानों से पूरी तरह छूट दी गई है? कोर्ट ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इस संबंध में स्पष्ट वैधानिक स्पष्टीकरण मांगा था।
📜 क्या धारा 24(4) के दायरे में आता है लोकायुक्त का काम?: खुफिया और सुरक्षा संगठनों को ही छूट देने का है कानूनी प्रावधान
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट कहा था कि देश की राज्य सरकारें सिर्फ और सिर्फ ‘सूचना का अधिकार अधिनियम 2005’ की धारा 24(4) के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग करके ही किन्हीं चुनिंदा संस्थाओं को आरटीआई से बाहर रख सकती हैं। कानूनन यह छूट केवल उन्हीं संस्थाओं या संगठनों को दी जा सकती है जो सीधे तौर पर खुफिया विभाग (Intelligence) और देश या राज्य की सुरक्षा (Security Organizations) से जुड़े कार्यों को संभालते हैं। शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि मध्य प्रदेश के लोकायुक्त संगठन के जिम्मे ऐसा कौन सा गोपनीय या सुरक्षा से जुड़ा काम है जो आरटीआई कानून की धारा 24(4) के अनिवार्य दायरे में आता है?
🔍 हाई कोर्ट ने 4.5 साल पहले ही दिया था आदेश: ‘कामता प्रसाद केस’ का हवाला देकर लोकायुक्त को सूचना देने के दिए थे निर्देश
उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट साढ़े चार साल पहले ही (20 दिसंबर 2021 को) ‘कामता प्रसाद बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ के चर्चित और ऐतिहासिक केस में अपना कड़ा फैसला सुना चुका है। हाई कोर्ट ने अपने उस आदेश में साफ तौर पर स्पष्ट किया था कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाला लोकायुक्त संगठन नागरिकों को सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जरूरी जानकारियां देने से कतई मना नहीं कर सकता है। हाई कोर्ट के इसी आदेश को आधार बनाकर इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर अब सर्वोच्च अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है, जो राज्य में आरटीआई कार्यकर्ताओं और पारदर्शिता की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
यह खबर आपको कैसी लगी?


मध्यप्रदेश




























