महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा बोलना और सीखना अनिवार्य किए जाने का विवादित फैसला अब देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) की चौखट पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर कड़ा संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि यह आम जनता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है, जिस पर कई गंभीर कानूनी सवालों के तहत विचार किया जाना आवश्यक है।
📜 1 मई 2026 से लागू किया गया था नियम, भाषा न जानने पर लाइसेंस-परमिट रद्द करने का था प्रावधान
गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार ने 1 मई 2026 से राज्य के सभी ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा में व्यवहार करना अनिवार्य कर दिया था। इस नियम का पालन न करने पर चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट रद्द करने तक का सख्त प्रावधान रखा गया था। इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि सरकार ने मराठी सीखने के लिए चालकों को एक साल की मोहलत दी है। इसी फैसले को चुनौती देते हुए एक ऑटो चालक ने अधिवक्ता विवेक शुक्ला और संजय पारिख के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की।
⚖️ ‘मौलिक अधिकारों और मोटर वाहन अधिनियम के खिलाफ’: 30 नवंबर 2026 को होगी अगली सुनवाई
जस्टिस पी. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि राज्य सरकार की यह अधिसूचना संविधान के प्रावधानों के विपरीत है और यह मोटर वाहन अधिनियम के नियमों के भी अनुरूप नहीं है। वकीलों ने तर्क दिया कि इससे केवल एक चालक नहीं, बल्कि हजारों बाहरी चालकों की आजीविका और मौलिक अधिकार सीधे प्रभावित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सरकार से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई की तारीख 30 नवंबर 2026 तय की है।
यह खबर आपको कैसी लगी?


महाराष्ट्र




























