कोडरमा (झारखंड): शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर आज एक ऐसे कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक की प्रेरक गाथा सामने आई है, जो तमाम भौगोलिक और प्राकृतिक चुनौतियों को मात देकर पूरी निष्ठा से राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं।
हम बात कर रहे हैं कोडरमा जिले के जरगा पंचायत के झरखी स्थित उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय सपहा की। यह विद्यालय घने जंगलों के बीच बेहद दुर्गम और सुदूरवर्ती पहाड़ी इलाके में बसा हुआ है। गांव तक पहुंचने का कोई पक्का मार्ग न होने के कारण ग्रामीणों और राहगीरों को सदा उफनती नदी पार करनी पड़ती है।
यही कारण है कि प्रत्येक बरसात के मौसम में यह गांव चारों ओर पानी से घिरकर पूरी तरह टापू में तब्दील हो जाता है। ऐसे बीहड़ इलाके में स्थित उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक ब्रह्मदेव शर्मा प्रतिदिन अपनी जान जोखिम में डालकर बच्चों को पढ़ाने पहुंचते हैं। वह इस पूरे विद्यालय में एकमात्र शिक्षक हैं, जिनके मजबूत कंधों पर क्षेत्र के दर्जनों नौनिहालों का भविष्य टिका हुआ है।
🌊 कमर तक उफनती वृंदाहा नदी को पार कर पहुंचते हैं स्कूल: बेसब्री से राह तकते हैं मासूम बच्चे
कठिन डगर और दैनिक संघर्ष की हकीकत:
18 किलोमीटर का दुर्गम सफर: प्रखंड मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित विद्यालय तक का सफर शिक्षक ब्रह्मदेव शर्मा के लिए किसी कड़ी परीक्षा से कम नहीं होता।
सफर का पड़ाव: वे प्रतिदिन सुबह अपनी मोटरसाइकिल से सपहा के लिए रवाना होते हैं, लेकिन कुछ दूरी तय करते ही सड़क खत्म हो जाती है और सामने उफनती वृंदाहा नदी की तेज धार रास्ता रोक देती है।
साहस और समर्पण: पानी के तेज बहाव में जब आम आदमी पैदल चलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता, तब शिक्षक ब्रह्मदेव शर्मा अपने बैग से हाफ पैंट निकालकर कपड़े बदलते हैं। एक हाथ में अपने जूते और दूसरे हाथ में जरूरी किताबों का बस्ता उठाकर वे नदी में उतर जाते हैं।
मुस्कान से मिटती है थकान: कमर से ऊपर तक तेज धारा को जान की बाजी लगाकर पार करने के बाद वे विद्यालय पहुंचते हैं, जहां मासूम छात्र-छात्राएं बेसब्री से उनकी राह देख रहे होते हैं।
बच्चों के प्रति अगाध प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा:⏳ 19 वर्षों से जारी है अटूट सेवा: विषम परिस्थितियों के बावजूद कभी नहीं लेते छुट्टी
19 वर्षों का सफर: शिक्षक ब्रह्मदेव शर्मा पिछले 19 वर्षों से लगातार इसी प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं और वर्षों से यहां अकेले ही सभी कक्षाओं का संचालन संभाल रहे हैं।
अटूट आत्मीय लगाव: लगभग दो दशकों से अनवरत सेवा देने के कारण उनका इस विद्यालय, ग्रामीणों और मासूम बच्चों से एक पारिवारिक व आत्मीय रिश्ता बन चुका है।
छुट्टी का विकल्प नकारा: वे बताते हैं कि बरसात के तीन-चार महीनों के दौरान स्कूल पहुंचना बेहद जोखिम भरा और कष्टकारी होता है। वे चाहते तो प्रशासनिक नियमों और प्राकृतिक आपदा का हवाला देकर लंबी छुट्टी ले सकते थे, लेकिन उन्होंने बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न होने देने के संकल्प के आगे कभी अवकाश नहीं लिया।
प्रेरणादायी दृष्टिकोण और समाज के लिए संदेश:📚 ‘यह महज नौकरी नहीं, जीवन की पवित्र जिम्मेदारी’: नौनिहालों के भविष्य के लिए समर्पित जीवन
पवित्र कर्तव्य: ब्रह्मदेव शर्मा का मानना है कि शिक्षक का दायित्व केवल वेतन के लिए की जाने वाली नौकरी नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ी के निर्माण की पवित्र जिम्मेदारी है।
भविष्य संवारने का संकल्प: वे कहते हैं कि इस पिछड़े व सुदूरवर्ती इलाके के बच्चों का उज्ज्वल भविष्य पूरी तरह उनके मार्गदर्शन पर निर्भर है। यदि वे ही हिम्मत हार जाएंगे, तो यह बच्चे अशिक्षा के अंधकार में रह जाएंगे।
शिक्षा की निरंतर लौ: यही अटूट संकल्प और निष्ठा है कि वे हर साल तेज बारिश, बाढ़ और घने जंगलों की परवाह किए बिना अपनी डगर पर अडिग रहते हैं और पिछले 19 सालों से इलाके में शिक्षा की अखंड ज्योति जला रहे हैं।
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