मथुरा (उत्तर प्रदेश): भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा में यमुना नदी के तट पर बसे घाट सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और कृष्ण लीलाओं की अनमोल धरोहर समेटे हुए हैं।
इन्हीं में से एक अत्यंत पावन स्थल है ‘कोयले घाट’। ब्रज की स्थानीय और पौराणिक परंपराओं में इस घाट को उसी ऐतिहासिक स्थान के रूप में पूजा जाता है, जहां कंस के कारागार में जन्म लेने के उपरांत वासुदेव बालक कृष्ण को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कराते हुए गोकुल ले गए थे। जन्माष्टमी के पावन पर्व पर कोयले घाट की महिमा और धार्मिक आस्था एक बार फिर श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का केंद्र बनी हुई है।
🧺 चरण स्पर्श के लिए बढ़ा था यमुना का जलस्तर: कृष्ण के स्पर्श से शांत हुई थीं लहरें
पौराणिक कथा और लीला का वर्णन:
कारागार से गोकुल की यात्रा: धार्मिक आख्यानों के अनुसार, कंस के कारागार में प्रभु श्रीकृष्ण के अवतरण के तुरंत बाद वासुदेव उन्हें एक सूप (टोकरी) में रखकर गोकुल स्थित नंदबाबा के घर की ओर निकल पड़े थे।
यमुना का उफान: उस भाद्रपद की अंधेरी रात में यमुना नदी अपने पूरे उफान पर थी। जैसे-जैसे वासुदेव नदी के गहरे जल में आगे बढ़े, जलस्तर बढ़ता चला गया।
चरणामृत की अभिलाषा: मान्यता है कि यमुना महारानी नवजात प्रभु के चरणों का स्पर्श पाने के लिए व्याकुल होकर ऊपर उठ रही थीं। वासुदेव जब डूबने की आशंका से चिंतित हुए, तब कान्हा ने टोकरी से अपना नन्हा चरण बाहर निकाला। प्रभु के चरण छूते ही यमुना शांत हो गईं और वासुदेव सकुशल गोकुल पहुंच गए।
घाट के नामकरण की पृष्ठभूमि:🗣️ ‘कोई ले’ की गुहार से पड़ा नाम: ब्रज की लोक परंपरा से जुड़ी है कहानी
लोककथा का संदर्भ: ब्रज फाउंडेशन के संदर्भों के अनुसार, लोकमान्यता है कि भारी बारिश और विकट संकट के बीच यमुना पार करते समय वासुदेव ने गोकुल किनारे पहुंचकर सहायता हेतु “कोई ले… कोई ले…” की पुकार लगाई थी।
कोयले घाट का स्वरूप: स्थानीय जनश्रुतियों में माना जाता है कि इसी पुकार के कारण कालक्रम में इस स्थान को ‘कोइले घाट’ या ‘कोयले घाट’ कहा जाने लगा।
श्रद्धा और परंपरा: यद्यपि यह वृत्तांत पारंपरिक लोककथाओं पर आधारित है, किंतु ब्रजवासियों और तीर्थयात्रियों के हृदय में इस स्थान के प्रति अटूट आस्था विद्यमान है।
घाट की भौगोलिक स्थिति और मनोरम दृश्य:📍 एक ओर मथुरा तो दूसरी ओर गोकुल: अद्भुत भौगोलिक दृश्य
गोकुल के सम्मुख तट: कोयले घाट की विशिष्टता इसका अद्वितीय स्थान है। यह यमुना के पश्चिमी किनारे पर स्थित है और यहां से नदी के ठीक उस पार गोकुल का मनोरम दृश्य प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है।
मथुरा और वृंदावन का संगम: ब्रज फाउंडेशन के अनुसार, इस घाट के एक छोर से वृंदावन का विस्तार और दूसरी दिशा में प्राचीन मथुरा नगरी का क्षेत्र दृष्टिगोचर होता है।
आध्यात्मिक छटा: यमुना के शांत प्रवाह और विहंगम प्राकृतिक दृश्यों के कारण यह स्थल आध्यात्मिक शांति और ध्यान के लिए भी प्रसिद्ध है।
आधुनिक समय में पौराणिक स्मृतियां:🌊 जब बाढ़ में जलमग्न हुई वासुदेव प्रतिमा: श्रद्धालुओं को याद आई द्वापर युग की लीला
बाढ़ के दौरान दृश्य: वर्ष 2010 और 2014 में जब यमुना में भीषण बाढ़ आई थी, तब कोयले घाट का बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया था।
कमर तक डूबी प्रतिमा: उस समय घाट पर स्थापित वासुदेव जी की भव्य प्रतिमा कमर तक यमुना जल में डूब गई थी।
साक्षात लीला का अहसास: उस दृश्य को देखकर स्थानीय श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों को द्वापर युग की वही घटना सजीव प्रतीत हुई, जब वासुदेव कृष्ण को सिर पर उठाए यमुना पार कर रहे थे।
आस्था और वर्तमान महत्व:🪔 जन्माष्टमी पर आस्था का बड़ा केंद्र: ब्रज की भक्ति संस्कृति की पहचान
तीर्थयात्रियों का जमावड़ा: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के महापर्व पर जब संपूर्ण मथुरा, वृंदावन और गोकुल रोशनी व भक्ति के रंग में सराबोर होते हैं, तब कोयले घाट पर भी विशेष दीपदान और पूजन अर्चन किया जाता है।
भक्ति की गहरी जड़ें: यह पावन स्थल आज भी ब्रज संस्कृति, लोक विश्वास और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति जनमानस के अगाध समर्पण का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।
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