ईरान: इस वर्ष ईरान में मुहर्रम और आशूरा का पर्व पहले से कहीं अधिक भावुकता और गम के माहौल में मनाया गया। फरवरी में हुए अमेरिका-इजरायल हमलों के बाद यह पहला मुहर्रम था, जिसमें लोगों ने इमाम हुसैन की शहादत के साथ-साथ हालिया युद्ध में मारे गए अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, सैन्य अधिकारियों और हजारों आम नागरिकों को भी याद किया। आशूरा का दिन 680 ईस्वी में हुई कर्बला की जंग की याद में मनाया जाता है। इमाम हुसैन ने यजीद की विशाल सेना के सामने अन्याय के खिलाफ डटकर कुर्बानी दी थी। यही कारण है कि आज भी आशूरा को दुनिया भर में ‘अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने’ का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। ईरान के शहरों और गांवों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे, सीना पीटकर मातम किया और नौहे (शोक गीत) गाकर इमाम की कुर्बानियों को नमन किया। आशूरा से एक दिन पहले ‘तासुआ’ मनाया गया, जिसमें इमाम हुसैन के सौतेले भाई हजरत अब्बास को याद किया गया, जो कर्बला में प्यासे बच्चों के लिए पानी लाते हुए शहीद हो गए थे। इस दौरान ईरान के अलावा इराक के पवित्र शहर कर्बला में भी दुनिया भर से लाखों जायरीन पहुंचे और इमाम की दरगाह पर अकीदत के फूल चढ़ाए। मुहर्रम के दौरान पूरे ईरान में ‘नज़री’ (मुफ्त भोजन) का वितरण किया गया। यह परंपरा इमाम हुसैन की इंसानियत, सेवा और उदारता की सीख को जीवंत रखती है। ज़रूरतमंदों और मातम करने वालों को भोजन कराकर लोगों ने कर्बला की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
🏴 आशूरा: अन्याय के खिलाफ कुर्बानी का दिन
💧 तासुआ और हजरत अब्बास की याद
🤲 इंसानियत और सेवा का संदेश
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ईरान: इस वर्ष ईरान में मुहर्रम और आशूरा का पर्व पहले से कहीं अधिक भावुकता और गम के माहौल में मनाया गया। फरवरी में हुए अमेरिका-इजरायल हमलों के बाद यह पहला मुहर्रम था, जिसमें लोगों ने इमाम हुसैन की शहादत के साथ-साथ हालिया युद्ध में मारे गए अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई, सैन्य अधिकारियों और हजारों आम नागरिकों को भी याद किया।
🏴 आशूरा: अन्याय के खिलाफ कुर्बानी का दिन
आशूरा का दिन 680 ईस्वी में हुई कर्बला की जंग की याद में मनाया जाता है। इमाम हुसैन ने यजीद की विशाल सेना के सामने अन्याय के खिलाफ डटकर कुर्बानी दी थी। यही कारण है कि आज भी आशूरा को दुनिया भर में ‘अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने’ का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। ईरान के शहरों और गांवों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे, सीना पीटकर मातम किया और नौहे (शोक गीत) गाकर इमाम की कुर्बानियों को नमन किया।
💧 तासुआ और हजरत अब्बास की याद
आशूरा से एक दिन पहले ‘तासुआ’ मनाया गया, जिसमें इमाम हुसैन के सौतेले भाई हजरत अब्बास को याद किया गया, जो कर्बला में प्यासे बच्चों के लिए पानी लाते हुए शहीद हो गए थे। इस दौरान ईरान के अलावा इराक के पवित्र शहर कर्बला में भी दुनिया भर से लाखों जायरीन पहुंचे और इमाम की दरगाह पर अकीदत के फूल चढ़ाए।
🤲 इंसानियत और सेवा का संदेश
मुहर्रम के दौरान पूरे ईरान में ‘नज़री’ (मुफ्त भोजन) का वितरण किया गया। यह परंपरा इमाम हुसैन की इंसानियत, सेवा और उदारता की सीख को जीवंत रखती है। ज़रूरतमंदों और मातम करने वालों को भोजन कराकर लोगों ने कर्बला की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।


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