रांची: झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान और भाषाई विविधता को बचाने के लिए मंगलवार को राजधानी रांची की सड़कों पर भारी जनसैलाब उमड़ा। झारखंड जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा मोर्चा के बैनर तले एक भव्य और विशाल रैली का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व प्रमुख आदिवासी नेता बंधु तिर्की ने किया। इस प्रदर्शन में राज्यभर से आए जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई से जुड़े अनगिनत विद्यार्थी, शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मचारी तथा विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि उत्साह के साथ शामिल हुए।
विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों की रही भारी भागीदारी, पारंपरिक वेशभूषा और ढोल-नगाड़ों के साथ सड़कों पर उतरा जनसैलाब
इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों के अंतर्गत संचालित जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभागों के विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। राजधानी रांची के अलावा झारखंड के दूर-दराज के अन्य जिलों से भी छात्र और शिक्षक अपना समर्थन देने पहुंचे थे। प्रदर्शनकारियों ने अपने हाथों में बैनर और तख्तियां थाम रखी थीं, जिन पर भाषा और संस्कृति की रक्षा से जुड़े नारे लिखे थे। इस दौरान झारखंड की पारंपरिक संस्कृति और आदिवासी पहचान की अद्भुत झलक भी देखने को मिली, जहां पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोगों ने ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत का अनूठा प्रदर्शन किया।
मोरहाबादी स्थित बापू वाटिका से निकाली गई रोष रैली, शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए सरकार तक पहुंचाई गई मांगें
इस विशाल रैली की शुरुआत रांची के प्रसिद्ध मोरहाबादी मैदान स्थित बापू वाटिका से की गई। बापू वाटिका से आरंभ होकर यह मार्च शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों और चौराहों से होकर गुजरा। रैली में शामिल लोगों ने एक स्वर में अपनी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के समर्थन में जोरदार आवाज बुलंद की। विद्यार्थियों की इस व्यापक और अनुशासित उपस्थिति ने इस पूरे आंदोलन को केवल एक शैक्षणिक मुद्दा न रहने देकर झारखंड की अस्मिता, संस्कृति और पहचान से जुड़ा एक बड़ा जनआंदोलन बना दिया।
शिक्षा और रोजगार के अवसरों में क्षेत्रीय भाषाओं को मिले प्रमुख स्थान, मोर्चा ने की व्यवस्था को मजबूत करने की पुरजोर मांग
प्रदर्शनकारियों और वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि झारखंड की तमाम जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं यहां की मूल सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर का मुख्य आधार हैं। इन भाषाओं में उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के लिए भविष्य में आगे बढ़ने के वास्ते पर्याप्त शैक्षणिक और व्यावसायिक अवसर मिलने बेहद आवश्यक हैं। मोर्चे की ओर से यह मांग उठाई गई कि विश्वविद्यालयों में भाषा विभागों को और अधिक सुदृढ़ किया जाए, नियमित पढ़ाई की पुख्ता व्यवस्था हो और इन भाषाओं को शैक्षणिक क्षेत्र में वह मान-सम्मान मिले जिसकी वे हकदार हैं। इस रैली के माध्यम से सरकार और संबंधित उच्च शिक्षा संस्थानों तक यह साफ संदेश पहुंचाया गया कि झारखंडी भाषाओं को केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें रोजगार और शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जाना चाहिए।
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