बिहार के कटिहार जिले के फलका प्रखंड स्थित मोरसंडा गांव से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने शासन और प्रशासन के विकास के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। गांव के अरविंद मंडल की मौत के बाद उनके परिजनों और ग्रामीणों को अंतिम संस्कार के लिए शव को कंधों पर उठाकर कमला नदी के पानी के बीच से गुजरना पड़ा। यह विचलित कर देने वाला वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
🏚️ दशकों से बुनियादी सुविधाओं का अभाव
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि सालों से वे इसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। नदी के दोनों किनारों पर भारी आबादी बसी है, लेकिन पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को कई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर काटना पड़ता है। यहां की वैकल्पिक नाव सेवा ओवरलोडिंग के कारण अक्सर जानलेवा साबित होती है, जिससे बचने के लिए लोग जोखिम भरे रास्तों को अपनाने को मजबूर हैं।
🛶 बाढ़ में और भी गंभीर हो जाते हैं हालात
ग्रामीणों ने बताया कि मानसून के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। जब पानी का स्तर बढ़ जाता है, तब लोग आपसी सहयोग से बांस का ‘चचरी पुल’ बनाकर आवाजाही करते हैं, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के चलते गांव के लोगों को हर दिन जान हथेली पर लेकर चलना पड़ता है।
⚖️ क्या बोले जिम्मेदार?
इस मामले पर कोढ़ा विधानसभा क्षेत्र की विधायक कविता पासवान का कहना है कि उन्होंने विधानसभा में पुल निर्माण का मुद्दा उठाया है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि तकनीकी कारणों से पुल का कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका, लेकिन अब इसे प्राथमिकता सूची में रखते हुए निर्माण कार्य को जल्द शुरू करने का प्रयास किया जाएगा।
संपादकीय टिप्पणी: एक तरफ देश डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी कई गांवों के विकास में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। क्या आपको लगता है कि प्रशासन को संवेदनशील क्षेत्रों में पुल निर्माण के लिए विशेष ‘फास्ट ट्रैक’ नीति अपनानी चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट्स में साझा करें।
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