नई दिल्ली: कानून के छात्रों की अनिवार्य उपस्थिति (Attendance) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले साल के उस निर्देश पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि केवल कम उपस्थिति के आधार पर छात्रों को परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जा सकता। यह आदेश बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है। कोर्ट ने अब इस मामले में 21 जुलाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
📜 क्या था 2016 का मामला?
यह कानूनी विवाद एमिटी यूनिवर्सिटी के एक छात्र की दुखद आत्महत्या के मामले से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, छात्र को कम उपस्थिति के कारण परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दिल्ली हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दिया था ताकि कानूनी शिक्षा के मानक और उपस्थिति संबंधी नियमों पर विस्तृत विचार किया जा सके।
🏛️ हाईकोर्ट का तर्क और विवादित फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि कानूनी शिक्षा केवल कक्षा में बैठने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कोर्ट का मानना था कि मूट कोर्ट, सेमिनार, मॉक पार्लियामेंट और वाद-विवाद जैसी गतिविधियों को भी अकादमिक क्रेडिट दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट के अनुसार, उपस्थिति के कठोर नियम छात्रों की रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच को सीमित करते हैं। इसी ‘पैरा 249’ के तहत दिए गए इन निर्देशों पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है, जिससे अब फिर से उपस्थिति संबंधी नियमों को लेकर कानूनी बहस शुरू हो गई है।
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