उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी ड्राफ्ट लिस्ट ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. इस सूची में करीब 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जो कुल मतदाता का लगभग 18 प्रतिशत है. इतने बड़े पैमाने पर हुई कटौती ने न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक असर को लेकर भी बहस तेज हो गई है.
SIR ड्राफ्ट लिस्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे बड़ा झटका राजधानी लखनऊ को लगा है. यहां पहले करीब 39.94 लाख मतदाता दर्ज थे, जो अब घटकर लगभग 27.94 लाख रह गए हैं. यानी करीब 12 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हट गए. राजधानी में इतनी बड़ी संख्या में वोट कटने को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कटौती वास्तव में सत्यापन से जुड़ी है या इसके पीछे कोई और कारण हैं.
मुस्लिम बहुल जिलों में कटौती का मुद्दा
ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के बाद जिन जिलों पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, उनमें सहारनपुर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, रामपुर और संभल जैसे मुस्लिम बहुल जिले शामिल हैं. इन जिलों में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत या उससे अधिक बताई जाती है. आंकड़ों के मुताबिक यहां 15 से 19 प्रतिशत तक मतदाताओं के नाम सूची से हटे हैं. इसी आधार पर विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों में अनुपात से ज्यादा वोट कटे हैं, जिससे चुनावी संतुलन प्रभावित हो सकता है.
चुनावी गणित पर क्या होगा संभावित असर?
इन पांच मुस्लिम बहुल जिलों में कुल 28 विधानसभा सीटें आती हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर मुकाबला काफी कड़ा रहा था. सपा गठबंधन ने इनमें से अधिक सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को भी अच्छी संख्या में सफलता मिली थी. अब जब मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ है, तो राजनीतिक दल यह आकलन कर रहे हैं कि इसका आगामी चुनावों पर क्या असर पड़ेगा. वोटरों की संख्या में कमी से सीटों के नतीजे बदल सकते हैं, यही वजह है कि यह मुद्दा सियासी बहस का केंद्र बन गया है.
मुरादाबाद जनपद
सहारनपुर
मुजफ्फरनगर
रामपुर
संभल
आजमगढ़
अलीगढ़
मेरठ
बरेली
जिन लोगों के नाम कटे वे दर्ज करा सकते हैं आपत्ति
प्रशासन की ओर से कहा जा रहा है कि यह ड्राफ्ट लिस्ट है और इसमें सुधार की पूरी गुंजाइश है. जिन मतदाताओं के नाम कट गए हैं, वे आपत्ति दर्ज करा सकते हैं और आवश्यक दस्तावेजों के साथ अपना नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं. अधिकारियों का दावा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के तहत की गई है और इसका उद्देश्य फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना है.
सियासी गलियारों में क्यों बढ़ी सरगर्मी?
प्रशासनिक दावों के बावजूद विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर है. उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में वोट कटना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरे की घंटी है. दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल इसे नियमित और आवश्यक प्रक्रिया बता रहा है. आने वाले दिनों में आपत्तियों, सुधार और अंतिम मतदाता सूची के बाद ही साफ हो पाएगा कि यह कटौती तकनीकी सुधार थी या इसके राजनीतिक मायने भी निकलेंगे. फिलहाल, SIR ड्राफ्ट लिस्ट उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे गर्म मुद्दा बन चुकी है.
यह खबर आपको कैसी लगी?


उत्तरप्रदेश




























