मुंबई (अनिल बेदाग): स्टेज 4 कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात देने के बाद अभिनेत्री रोज़लिन खान ने एक और असाधारण साहस का परिचय दिया है। बिना किसी कानूनी प्रशिक्षण के उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत में स्वयं अपना पक्ष रखा और यह साबित कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति किसी भी चुनौती से बड़ी होती है। लगभग दस वर्षों से लंबित कानूनी लड़ाई अब अपने अंतिम पड़ाव पर है और फैसले का इंतजार है।
वकीलों की फौज के सामने हिंदी में पेश की दलीलें
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच के सामने रोज़लिन बिना किसी औपचारिक कानूनी शिक्षा के स्वयं एक पक्षकार के रूप में पेश हुईं। दूसरी ओर वकीलों की पूरी टीम मौजूद थी, लेकिन उन्होंने अपने तर्क खुद हिंदी में रखे। उनका कहना है कि हिंदी में सुनवाई होने से उन्हें पूरी कार्यवाही समझने में आसानी हुई। यह मामला पेशेवर कदाचार से जुड़ा है, जो लगभग एक दशक से बार काउंसिल प्रणाली में लंबित है। तमाम चुनौतियों के बावजूद रोज़लिन ने हार नहीं मानी। कीमोथेरेपी, अस्पतालों के चक्कर और रिकवरी के दौर के बीच भी वह नियमित रूप से अदालत में उपस्थित होती रहीं।
‘कैंसर हो या कोर्ट, मैंने हर लड़ाई सामने से लड़ी है’
सुनवाई के दौरान जब उन्होंने अपनी दलीलें आगे बढ़ाने का अनुरोध किया तो न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा, “4 बजे के बाद यहाँ सुनवाई नहीं होती।” अब सभी बहसें पूरी हो चुकी हैं और अदालत का फैसला सुरक्षित है। रोज़लिन कहती हैं, “मैं चीजों और जिंदगी को अपने ढंग से जीती हूं। कैंसर हो या कोर्ट, मैंने हर लड़ाई सामने से लड़ी है।” उनकी यह यात्रा न केवल कानूनी संघर्ष की कहानी है, बल्कि साहस, आत्मविश्वास और कभी हार न मानने वाले जज़्बे की प्रेरक मिसाल भी है।
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