सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बहुत ही गंभीर सवाल पूछते हुए कहा कि अगर कोई श्रद्धालु पूरे मन से मंदिर जाता है, लेकिन उसे मूर्ति छूने की इजाजत नहीं दी जाती, तो क्या संविधान उसकी रक्षा नहीं करेगा? यह सवाल कोर्ट ने सबरीमला मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा. कोर्ट इस समय केरल के सबरीमाला मंदिर समेत दूसरे धार्मिक स्थानों पर होने वाले भेदभाव की सुनवाई कर रहा है. खासकर, महिलाओं और कुछ खास समुदायों के लोगों को मंदिरों में आने या पूजा करने पर लगी पाबंदियों पर कोर्ट में सवाल उठाए जा रहे हैं.
मंदिर के पुजारी की तरफ से वरिष्ठ वकील वी. गिरी ने दलील दी. उन्होंने कहा: सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने बहुत साफ शब्दों में पूछा, “जब मैं मंदिर जाता हूं, तो मेरी पूरी आस्था होती है कि वह भगवान ही मेरा सिरजनहार है. मैं बिल्कुल साफ मन से जाता हूं, मेरे दिल में कोई गंदगी नहीं होती. लेकिन वहां जाकर मुझे बता दिया जाता है कि मेरे जन्म या मेरी जाति की वजह से मैं भगवान को छू नहीं सकता. तो बताइए, क्या संविधान मेरी मदद नहीं करेगा?” जस्टिस ने आगे कहा कि भगवान और उसकी बनाई सृष्टि (इंसान) में कोई फर्क नहीं हो सकता. अगर भगवान ने सबको बनाया है, तो फिर किसी एक को छूने से कैसे रोका जा सकता है? पुजारी के वकील ने कहा कि अगर किसी जाति या जन्म की वजह से किसी को पुजारी बनने से पूरी तरह रोका जाता है, तो उसका समाधान संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत कानून बनाकर किया जा सकता है. यानी राज्य या कानून इस मामले में हस्तक्षेप कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट यह जानना चाह रहा है कि क्या धार्मिक रीति-रिवाजों के नाम पर किसी श्रद्धालु को भेदभाव सहना पड़ेगा? क्या संविधान का संरक्षण सिर्फ कुछ लोगों के लिए है या हर उस इंसान के लिए है, जो ईमानदारी से पूजा करने मंदिर पहुंचता है? इस मामले की सुनवाई अभी जारी है. अब देखना होगा इसपर क्या आखिरी फैसला लिया जाएगा.
पुजारी की तरफ से क्या कहा गया?
तब जस्टिस अमानुल्ला ने पूछा ये सवाल
पुजारी के वकील ने जस्टिस का दिया जवाब
यह खबर आपको कैसी लगी?


देश


























