खंडवा | राजनीतिक एवं राष्ट्रीय समाचार
देश में न्याय तक पहुंच को आम नागरिकों के लिए और अधिक आसान बनाने की दिशा में खंडवा के भाजपा सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने लोकसभा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जोरदार प्रस्ताव पेश किया है। इस प्रस्ताव के माध्यम से उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में भाषाई सरलता लाने और आम आदमी की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
🏛️ हाईकोर्ट की कार्यवाही और आदेशों की भाषा हो हिंदी
समाजसेवी व प्रवक्ता सुनील जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने मध्य प्रदेश और अन्य हिंदी भाषी राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) में होने वाली अदालती कार्यवाही और पारित होने वाले आदेशों की भाषा हिंदी करने की पुरजोर मांग उठाई है। सांसद पाटिल ने सदन को बताया कि वर्तमान में अधिकांश उच्च और जिला न्यायालय मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में कार्यरत हैं।
👨⚖️ अंग्रेजी न जानने के कारण वकीलों पर निर्भर रहते हैं गरीब
सांसद पाटिल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि अदालतों का काम अंग्रेजी में होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र के लोग और गरीब नागरिक, जो अंग्रेजी भाषा से परिचित नहीं हैं, वे अपने मामलों के लिए वकीलों पर पूरी तरह से निर्भर हो जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि वे अपने ही मुकदमों की वास्तविक स्थिति और न्यायालय के फैसलों को समझने में पूरी तरह असमर्थ रहते हैं। इसी भाषाई बाधा की वजह से आम लोग देश की न्याय प्रणाली से खुद को कटा हुआ महसूस करते हैं।
⚖️ अनुच्छेद 348(2) और राजभाषा अधिनियम का दिया हवाला
प्रवक्ता सुनील जैन ने बताया कि सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने लोकसभा में भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(2) और राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 7 का प्रमुखता से हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालयों में हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग को अनिवार्य करने से न्यायिक प्रक्रिया कहीं अधिक जनसुलभ और पारदर्शी बनेगी। उन्होंने केंद्र सरकार से विशेष आग्रह किया कि हिंदी को न्यायालयीन कार्यवाही और आदेशों की प्रमुख भाषा के रूप में प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
🇮🇳 समान न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने का सार्थक प्रयास
सांसद पाटिल ने इस कदम को देश के प्रत्येक नागरिक के लिए ‘समान न्याय’ तक पहुंच सुनिश्चित करने और हिंदी भाषी राज्यों के करोड़ों नागरिकों के लिए जटिल न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। लोकसभा में पेश किए गए इस प्रस्ताव के माध्यम से राजभाषा हिंदी के सम्मान और प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ, देश की न्याय व्यवस्था में आम जनता की समझ और भागीदारी बढ़ाने का एक बेहद सार्थक प्रयास किया गया है।
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