खंडवा। मंगलवार को आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग म.प्र. शासन द्वारा ‘शंकर प्रकटोत्सव एकात्म पर्व’ का समापन जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, चिन्मय मिशन के पूर्व वैश्विक प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री मध्यप्रदेश शासन धर्मेन्द्र सिंह लोधी, दक्षिणामूर्ति मठ के प्रमुख स्वामी पूर्णानंद गिरी, मां पूर्ण प्रज्ञा, प्रख्यात शिक्षाविद् गौतम भाई पटेल, महंत मंगलदास त्यागी तथा वेंकटेश्वर वेद विज्ञान पीठम् के प्राचार्य ब्रह्मर्षि कुप्प शिव सुब्रमण्यम अवधानी की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम में इस वर्ष के अद्वैत युवा जागरण शिविर के शंकरदूतों ने एकात्मता का संकल्प लिया। मंचस्थ अतिथियों का स्वागत एवं एकात्म पर्व के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री ने कहा कि यह अद्वैत वेदांत के लोकव्यापी प्रसार के माध्यम से वैश्विक एकात्मता का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। न्यास का मुख्य उद्देश्य मानवता को संत्रासों से उबारने के लिए एकात्म बोध से अनुप्राणित करना है। इस विजन के अंतर्गत ओंकारेश्वर में आचार्य शंकर की 108 फीट ऊंची एकात्मता की मूर्ति, शंकर संग्रहालय और अंतर्राष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की स्थापना का कार्य तीव्र गति से जारी है।
🚶♂️ कलाड़ी से केदारनाथ तक प्रस्तावित है ‘एकात्म यात्रा’
स्वागत भाषण और न्यास की प्रस्तावना देते हुए उप मुख्य कार्यपालन अधिकारी, आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास डॉ. शैलेन्द्र मिश्रा ने आदि शंकराचार्य के प्राकट्योत्सव के अवसर पर बताया कि ओंकारेश्वर को एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। उन्होंने 2025 में प्रयागराज में आयोजित एकात्म धाम शिविर का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें अद्वैत वेदांत पर केंद्रित संवाद, ध्यान, शास्त्रार्थ और वैदिक अनुष्ठानों का सफल आयोजन हुआ। आगामी सिंहस्थ 2028 से पूर्व जनवरी से अप्रैल 2027 तक कलाड़ी से केदारनाथ तक लगभग 17 हजार किलोमीटर की ‘एकात्म यात्रा’ प्रस्तावित है, जिसमें विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाएं सहभागी होंगी।
🌍 ओंकारेश्वर से उठी एकात्मता की पुकार, विश्व शांति का संकल्प
स्वामी अवधेशानंद गिरि ने अपने वक्तव्य में एकात्मता के वैश्विक संदेश को प्रसारित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब शंकरदूत केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि आचार्य शंकर भगवत्पाद का संदेश लेकर विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुंचें। उन्होंने स्वीकार किया कि अब तक हम अपने धर्म और दर्शन का वैश्विक स्तर पर पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं कर सके, परंतु अब यह सीमा तोड़ने का समय है। उन्होंने आचार्य शंकर के योगदान की तुलना द्वापर युग के वेदव्यास से करते हुए कहा कि जिस प्रकार वेदव्यास ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, उसी प्रकार शंकराचार्य ने उसे पुनर्जीवित कर समाज तक पहुंचाया। कार्यक्रम में वीडियो माध्यम से जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती के आशीर्वचन भी प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रकल्पों की आज अत्यंत आवश्यकता है, जो आदि शंकराचार्य के विचारों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाएं। शंकराचार्य ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए चारों दिशाओं में आम्नाय पीठों की स्थापना की, जहां से एकता और अद्वैत का संदेश प्रसारित हुआ।
✨ प्रकट न होते श्री शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान
बीज वक्तव्य में स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने अपने विचार रखते हुए कहा कि यदि शंकराचार्य का प्राकट्य न हुआ होता, तो ज्ञान अज्ञान के अंधकार में ही डूबा रहता—”प्रकट न होते श्री शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान, उनकी कृपा हो हम सब पर ही, और रहे कृपा का भान।” यह संबोधन अद्वैत की गहराई को उजागर करने के साथ-साथ जीवन में एकत्व की भावना को अपनाने का संदेश देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने कहा कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं, भारत की पारंपरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है। मात्र 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत होना, उनके ईश्वरीय स्वरूप का प्रमाण है। एकात्म धाम को म.प्र. शासन द्वारा वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करते हुए 2400 करोड़ की लागत से इसका निर्माण किया जा रहा है। स्वामी पूर्णानंद गिरि जी ने अद्वैत वेदांत की परंपरा और उसके साधना पक्ष को स्पष्ट किया। वहीं, स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती और मां पूर्णप्रज्ञा ने शंकराचार्य के जीवन को समाज में एकता, धर्म और आध्यात्मिक जागरूकता के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया।
🏅 अद्वैत के आलोक स्तंभों का किया गया सम्मान
इस अवसर पर शैक्षणिक जगत की दो प्रखर विभूतियों को सम्मानित किया गया। चिन्मय मिशन के पूर्व प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद जी को उनकी अखंड अद्वैत निष्ठा के लिए और प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर गौतम भाई पटेल को संस्कृत वांग्मय व अद्वैत दर्शन में अतुलनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। प्रो. पटेल ने आचार्य शंकर की संपूर्ण कृतियों का पहली बार गुजराती भाषा में अनुवाद करने का ऐतिहासिक संकल्प लिया है। साथ ही हैदराबाद से पधारे परम पूज्य ज्येष्ठ ब्रह्मश्री वेदमूर्ति कुप्पा रामगोपाल वाजपेयया तथा उनकी धर्मपत्नी कुप्पा कल्पकाम्बा सोमपीठनी को वैदिक अनुष्ठान के प्रति समर्पण के लिए कृतज्ञता स्वरूप आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा भेंट की गई। पत्रकारिता विभाग के छात्रों को भी प्रायोगिक समाचार पत्र तैयार करने हेतु सम्मानित किया गया।
🙏 नेपाल, बांग्लादेश सहित देश-विदेश के 700 युवा बने ‘शंकरदूत’
वैशाख शुक्ल पंचमी पर जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि एवं अन्य संतों की उपस्थिति में प्रातः 6 बजे नर्मदा तट पर आयोजित दीक्षा समारोह में देश-विदेश के 700 से अधिक युवा ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षित हुए। इन अद्वैत जागरण शिविरों में देश-विदेश के युवा एवं नागरिक बड़ी संख्या में सम्मिलित हो रहे हैं। वर्ष 2020 से शुरू हुए इन शिविरों में अभी तक स्पेन, इंडोनेशिया, नीदरलैंड, बांग्लादेश, टर्की, नेपाल, अमेरिका एवं भारत के 25 से अधिक राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के आईआईटियन, प्रोफेसर्स, प्रोफेशनल्स, डॉक्टर्स, आर्टिस्ट, वैज्ञानिक, आर्मी ऑफिसर्स, प्रशासनिक अधिकारी व शोधार्थियों सहित 1800 से अधिक युवा एवं जिज्ञासु सहभागिता कर चुके हैं। पंचम दीक्षा समारोह में देश-विदेश से लगभग 700 शिविरार्थियों को शंकरदूत के रूप में दीक्षा दी गई।
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